प्रिय साथियों, मैं एक भारतीय मगरमच्छ हूं

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भारतवर्ष के मेरे प्रिय साथियों,

मैं एक ‘मगर’ हूं- भारत में पाया जाने वाला एक विशेष प्रकार का घड़ियाल. मैं लूटने/ठगी करने में माहिर हूं. दरअसल, मैं लूटने/ठगी करने के लिए हीं पैदा हुआ था. मैं (आप सब को) यह पत्र इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि इन दिनों मेरा नाम बहुत बदनाम किया जा रहा है. आप सब बिना कुछ सोचे-समझे मुझ पर ‘घड़ियाली आंसू’ बहाने का आरोप लगा कर मुझे यहां-वहां की बातें सुनाए जा रहे हैं.

क्या आप सब ‘मगरमच्छ के आंसू’ मुहावरे का असली मतलब जानते भी हैं? मैं बताता हूं! ‘द वायेज एंड ट्रैवेल्ज़ ऑफ सर जॉन मैंडेविल’ साल 1400 में प्रकाशित हुई थी और इस सारी शरारत की जड़ भी वह हीं हैं! यह वही शख़्श हैं जिसने बिना किसी वैज्ञानिक आधार के यह सब बकवास शुरू की थी. इस किताब में उन्होंने लिखा है, ‘उस देश में मगरमच्छों की भरमार है.ये सर्प जाति के जीव आदमियों को मारने के बाद रोते हुए उन्हें खा जाते हैं.’ देखा! सरासर झूठ!

सबसे पहले, मुझे यह भी पूरी तरह से यकीन नहीं है कि मैंडविल असल में किस देश का जिक्र कर रहा था- यह भारत तो नहीं हो सकता. मैं एक ‘मगर’ हूं – मीठे पानी से पैदा हुए दलदल में पलने वाला एक स्वाभिमानी मगरमच्छ (क्रोकॉडयलुस पैलुस्ट्रिस) हूं जिसका थूथना काफ़ी चौड़ा होता है और मैं बिना बात के कभी भी आंसू नहीं बहाता!

हम मगरमच्छ बिना बात रोने वाले बालक नहीं हैं. कृपया समझने की कोशिश करें कि हम कई मामलों में बहुत शक्तिशाली भी होते हैं. हम तेज-तर्रार तैराक होते हैं जो आवश्यकता पड़ने पर जमीन पर भी चल सकते हैं. मेरे आंसुओं के बारे में बातें बना-बना के तुम सब मुझे ‘बदनाम’ करने पर क्यों तुले हो? खासकर मीडियावाले, जिनके पास और कोई काम-धंधा ही नहीं. भाई, कोई और टारगेट (निशाना) चुनो ना? मुझे निशाना बना कर घटिया/बेहूदा मजाक बनाना और मेरे ‘रोने-धोने’ के ज़िक्र को अख़बारों के मुख्य पृष्ठ पर जगह देना निहायत ही बेवकूफी भरा काम है.

थोड़ी सी रिसर्च (पड़ताल) के बाद ही तुम्हें पता चल जाएगा कि मैं कौन हूं और क्या (बला) हूं. एक वयस्क पुरुष के रूप में मेरा वजन और ऊंचाई दोनो बहुत प्रभावशाली है. मैं 10 फीट तक लंबा हो सकता हूं और मेरा वजन तो 200 किलो तक भी हो सकता है और कृपया करके मेरे सीने के माप और इस तरह की अन्य बकवास के बारे में पूछने की हिमाकत कतई ना करें! बस मेरी यह बात गांठ बांध लीजिए कि मैं इतना खतरनाक हूं कि अपनी पूंछ के एक ही चाबुक जैसे वार से  किसी भी दुश्मन की हालत पतली कर सकता हूं.

मैं बंगाल के ख़ूंख़ार बाघों और बाघिनों का भी बखूबी मुकाबला कर सकता हूं. मुझ पर यकीन नहीं हैं? ज़रा मेरे वीडियो तो देखें. मैं अपने प्राकृतिक अस्तित्व की रक्षा वाली मूल प्रवृत्ति – मेरे सूंघने, सुनने और देखने की तीव्र बोध के कारण – की मदद से अपने बड़े से बड़े दुश्मनों को भी रणनीतिक सटीकता के साथ धूल चटा सकता हूं. विषम परिस्थितियों में ‘पेट के बल रेंगने’ की मेरी क्षमता के कारण मुझे किसी जाल में फंसना भी मुश्किल हो जाता है, और ज़रूरत पड़ने पर मैं पानी में भी चल सकता हूं.

लेकिन जब मुझे कोई धमकी दी जाती है, या मुझे किसी तरह की चुनौती/ प्रतिस्पर्धा का एहसास होता है तो – बाप रे बाप – किसी के लिए भी कोई अवसर तक नहीं बचता. मेरे जबड़े काफ़ी चालाक या तेज तर्रार माने जाने वाले दुश्मनों को भी एक ही चोट में गटक कर सकते हैं. सरीसृपों के बीच की आपसी प्रतियोगिता में तो मैं एक अजगर को भी आराम से धराशायी कर सकता हूं। कुत्ते, चूहे और बंदर तो मेरे लिए बच्चों के खेल जैसे हैं.

(कुछ) शोधकर्ताओं का कहना है कि हम खाना चबाते हुए चिल्लाते हैं. यह बिल्कुल सटीक विवरण है. हम वाकई में ऐसा करते हैं! हमारे लिए आंसू को बहाना उतना आसान भी नहीं है. जब हम अपने शिकार को हजम करते हैं तो हम वाकई में रोते हैं – आख़िर दुश्मनों को खाने और चबाने में मेहनत और समय तो लगता ही है. इसमे हमारी सांस लेने की क्षमता भी काफ़ी प्रभावित होती है. अभी तो आप लोगों की भी सांस बुरी तरह फूल रही है, तो आप सब मेरी कठिनाई को आसानी से समझोगे.

जब भी कोई विकट स्थिति उत्पन्न होती है, तो मुझे पहले से पता होता है कि करना क्या है – मैं चुप -चाप सबकी नज़र से ओझल हो जाता हूं! मैं एक गड्ढा खोद लेता हूं और उस में तब तक छिपा रहता हूं जब तक कि वातावरण सुधर ना जाए और उसकी मारक क्षमता कम न हो जाए. इस तरह से हम सभी मगरमच्छ फलते-फूलते और समृद्ध होते रहते हैं. संकट काल में एक सुरक्षित क्षेत्र में पीछे हट जाना और इसके टल जाने तक इंतजार करना भी एक स्मार्ट तरीका है. आख़िर मगरमच्छों को भी कुछ ऐसे अप्रत्याशित संकटों से जूझना ही पड़ता है जिन्हें वे भी संभाल नहीं सकते. आख़िर क्यों हम अपने आप को अमित्रवत/मित्रताहीन तत्वों के सामने उजागर करें? मछुआरों द्वारा हमें फंसाने के लिए बिछाए गए जाल से हम भी परेशान हो जाते हैं – लेकिन फिर हम किताब में लिखी हर चाल का इस्तेमाल खुद को इससे अलग करने के लिए करते हैं.

हम मगरमच्छ आप सब का  ‘बंदर’ बना सकते हैं

हम मगरमच्छ काफ़ी गलत समझे जाने वाले प्राणी हैं. खासकर इन दिनों! लोग यह कतई नहीं समझ पाते कि सभी मगरमच्छ एक जैसे नहीं होते हैं. हमारी इस महान, बड़ी सी दुनिया में मगरमच्छों की 23 अलग- अलग प्रजातियां होती हैं. हमें यह सीखना होगा कि कैसे एक दूसरे को और साथ -साथ दूसरों को भी ‘मैनेज’ किया जाए. सामान्य काल में, यह बहुत कठिन नहीं होता है. लेकिन यह कोई सामान्य काल है ही नहीं! जैसे तेंदुए अपने शरीर पर बने धब्बे (निशान) नहीं बदल सकते, वैसे ही मगरमच्छ भी बगीचों में पलने वाले हानिरहित सांपों की तरह व्यवहार नहीं कर सकते और चुपचाप दूर नही सड़क सकते.

इस तरह का रवैया हमारी छवि को काफ़ी नुकसान पहुंचा सकता है! हमें सबको दिखाना होगा कि हम डरते कतई नहीं हैं. साथ ही, हम पूरी तरह से हृदयहीन भी नहीं हैं. एक स्वाभिमानी मगरमच्छ के रूप में हमारा भी बहुत कुछ दांव पर लगा है और पकड़े जाने के जोखिम के बिना एक अच्छे ‘टूलकिट’ के साथ मदद वाला कोई सक्षम साथी भी नहीं है.

जातक कथाओं में एक ऐसे बंदर की कहानी है जो मगरमच्छ की पीठ पर बैठ कर उसे ही मात दे देता है. संस्कृत में ‘मकर’ नामक एक पौराणिक मगरमच्छ जैसे प्राणी का भी वर्णन है. कृपया, इन सभी पुरातन कहानियों पर मत जाइए. मेरी तरफ देखिए. मैं 21वीं सदी का मगरमच्छ! सभी लुटेरों (मगरमच्छों) को हराने में सक्षम एक ही लुटेरा (मगरमच्छ)! मैं आप सभी 1.4 अरब लोगों को बंदर (बेवक़ूफ़) बना सकता हूं. याद रखें, मगरमच्छ भी रो सकते हैं! इसलिए, कृपया मेरे आंसुओं का मजाक न उड़ाएं और यह ना कहें कि मैं संकट के समय बेकार तरीके से काम कर रहा हूं. मैं वही कर रहा हूं जो मैं एक लुटेरे के रूप में सबसे अच्छा करता हूं – लूट. अब आप सब अपना काम करें और कृपया #CrocsCareCrocsCry फंड में उदारतापूर्वक योगदान करें.

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