केंद्र की मोदी सरकार बताए किसको कितना दे रही

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पत्रकारों को अपना काम करते हुए अक्सर यह सुनने को मिलता है कि मीडिया बिका हुआ है, दिल्ली की सीमा पर किसानों के प्रदर्शनों को कवर करते हुए कई पत्रकारों को ऐसी बात सुननी पड़ी, चूंकि प्रदर्शनकारियों को महसूस हो रहा था कि उनके विरोध प्रदर्शन की खबरें केंद्र सरकार के एंगल से दिखाई-छापी जा रही थीं.

जब मीडिया के एक तबके ने उन्हें ‘खालिस्तानी आतंकवादी’ कहा तो प्रदर्शनकारियों ने कहा कि ऐसा सरकार के इशारे पर किया गया है. तो क्या इस दावे में सच्चाई है कि सरकार मीडिया को ‘काबू में’ करने की कोशिश करती है? और क्या प्रेस विज्ञापन वह वित्तीय ‘लीवर’ है जिसे सरकारें मीडिया को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल करती हैं?

इसका सीधा सा जवाब है- हां, यही वजह है कि केंद्र और राज्य सरकारें, दोनों सभी तरह के मीडिया, खासकर प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक पर विज्ञापनों के लिए अपना खजाना खोल देती हैं. लोकसभा में एक संसद सदस्य के लिखित सवाल के जवाब में ब्यूरो ऑफ कम्यूनिकेशन (बीओसी) ने यह जानकारी दी कि तीन वित्तीय वर्षों में न्यूजपेपर विज्ञापनों पर केंद्रीय मंत्रालयों ने कितना खर्च किया.

ये इस प्रकार है-

वित्तीय वर्ष 2017-18 – 462.22 करोड़ रुपए

वित्तीय वर्ष 2018-19 – 301.03 करोड़ रुपए

वित्तीय वर्ष 2019-20 – 128.96 करोड़ रुपए

लेकिन पूछिए कि सरकारी योजनाओं और नीतियों के प्रचार के लिए इस्तेमाल होने वाला पैसा किसका है? यह आपका पैसा है, टैक्सपेयर का पैसा। ‘सरकार का पैसा’ जैसी तो कोई चीज़ होती ही नहीं, यह तो ‘टैक्सपेयर का पैसा’ होता है. सरकार के दूसरे खर्चों की ही तरह, इस मामले में भी टैक्सपेयर यह तय नहीं कर सकता कि विज्ञापनों पर पैसा कैसे खर्च किया जाना चाहिए, लेकिन पारदर्शिता का क्या? इस संबंध में कुछ गाइडलाइंस हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को विज्ञापन कैसे बांटने हैं, इस पर सरकार की तरफ से बहुत कम, या यूं कहें कि पादर्शिता है ही नहीं.

प्रसार भारती के पूर्व सीईओ जवाहर सरकार ने कहा है कि केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने 2020 में मीडिया हाउसेज को विज्ञापन देने के लिए नए नियम जारी किए थे, प्रिंट मीडिया विज्ञापन नीति (2020) में न्यूजपेपर के एम्पैनेलमेंट, विज्ञापन की दरों, बिल के भुगतान और जुर्माने के लिए स्पष्ट प्रक्रियाएं हैं, सरकारी विज्ञापन अब ब्यूरो ऑफ कम्यूनिकेशन के जरिए भेजे जाते हैं.

को-फाउंडर और सीईओ न्यूजलॉन्ड्री अभिनंदन सेखरी का कहना है कि नई नीति में काफी अस्पष्टता है, भारत में एक और दिक्कत है- न्यूजपेपर या चैनल्स की पहुंच कितनी है, यह कैसे पता चलेगा, हम ब्रॉडकास्ट ऑडियंस रिसर्च काउंसिल यानी बार्क के स्कैंडल से वाकिफ हैं, न्यूजपेपर्स के सर्कुलेशन की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े किए जाते हैं. इसलिए, यह कैसे तय किया जाए कि किसी खास मीडिया संगठन को दिए जाने वाले किसी खास विज्ञापन की दर क्या होनी चाहिए?

पेमेंट में देरी: यह तो सरकार की मर्जी पर निर्भर है

अगर आप प्रिंट मीडिया विज्ञापन नीति (2020) के सेक्शन ‘पेमेंट और बिल्स’ को देखेंगे तो पता चलेगा कि नए नियम अब भी कितने अस्पष्ट हैं. इस सेक्शन में साफ लिखा है कि ‘हर पब्लिकेशन को विज्ञापन छपने के 30 दिनों के भीतर सपोर्टिव डॉक्यूमेंट्स के साथ बिल्स सबमिट करने होंगे और बीओसी बिल्स को देरी से सबमिट करने पर जुर्माना लगा सकता है

लेकिन क्या पब्लिकेशंस को पेमेंट देने को लेकर भी ऐसे ही स्पष्ट नियम हैं? नए नियम सिर्फ इतना कहते हैं, “बीओसी बिल्स मिलने के 30 दिनों के भीतर पेमेंट करने की कोशिश करेगा.” अब यह शब्द ‘कोशिश’ पेमेंट देने की पूरी प्रक्रिया को बड़ी आसानी से अस्पष्ट बना देता है. पेमेंट देने में देरी करना भी मीडिया को अपने काबू में करने का एक हथियार है, सरकार कहते हैं, लॉ स्टूडेंट अनिकेत गौरव की आरटीआई पर सूचना एवं प्रसार मंत्रालय ने 28 जून, 2021 को यह खुलासा किया कि केंद्र पर प्रिंट मीडिया आउटलेट्स का 147 करोड़ रुपए बकाया है जो उसे सरकारी विज्ञापनों के पेमेंट के तौर पर देना है, सबसे पुराना बिल 2004 का है. इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बारे में मंत्रालय ने कहा कि बकाया बिल्स की पूरी सूची अभी तुरंत तैयार नहीं है.

प्रसार भारती के पूर्व सीईओ जवाहर सरकार ने कहा है कि, पेमेंट को लटकाने से सरकार के हाथों में डुगडुगी लग जाती है, ब्यूरोक्रेट्स मीडिया हाउसेज को एप्रोच कर सकते हैं और उनसे कह सकते हैं कि सरकार विरोधी खबरें न छापें, न दिखाएं, बीच में इस बात का इशारा होता है कि ऐसा करने पर पेमेंट और लटक सकता है, वे चालाकी से चाल चल सकते हैं कि अभी पब्लिश मत करो, सरकार को अभी रिलीज करना है आपका पेमेंट.

मीडिया हाउस भी दूध के धुले नहीं

समय आ गया है कि मीडिया भी अपनी कमाई के नए तरीके ईजाद करे और सरकारी विज्ञापनों पर अपनी निर्भरता को कम करे, क्योंकि तभी वह निष्पक्ष होकर पत्रकारिता कर पाएगा. जून 2018 में लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने संसद में एक बहस के दौरान नरेंद्र मोदी सरकार पर आरोप लगाया था कि उसने कई मशहूर अखबारों द हिंदू, द टाइम्स ऑफ इंडिया और द टेलीग्राफ को सरकारी विज्ञापन देने बंद कर दिए, चूंकि वे अपनी रिपोर्ट्स में सरकार की आलोचना करते हैं.

अप्रैल 2020 में कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक चिट्ठी लिखी और उसमें इस बात की पेशकश की कि सरकार के मीडिया विज्ञापनों को दो साल के लिए बंद कर दिया जाए ताकि देश में कोविड-19 महामारी से लड़ने के लिए वित्तीय संसाधन जुटाए जा सकें. सोनिया गांधी के इस प्रस्ताव की कई बड़े अखबारों ने आलोचना की.

का कहना है कि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया के अध्यक्ष सीमा मुस्तफा मैंने कई सालों से देखा है कि हर सरकार सत्ता में आने के बाद विज्ञापनों के जरिए मीडिया को कंट्रोल करती है। मुझे लगता है कि मीडिया हाउसेज़, चाहे कितने भी बड़े हों, इस निर्भरता को कायम रखने के लिए उतने ही दोषी हैं. मीडिया हाउस जितना बड़ा होता है, सरकार से विज्ञापन की उतनी ही ज्यादा उम्मीद करता है, वह कहती हैं कि सरकारी विज्ञापन देने पर सख्त गाइडलाइन्स होनी चाहिए ताकि सत्ता पर काबिज लोग उन लोगों को इनाम न दे पाएं जो उनके कहने पर चलते हैं, और उनकी कमाई न रोक सकें, जो ऐसा नहीं करते.

को-फाउंडर और सीईओ न्यूजलॉन्ड्री अभिनंदन सेखरी का कहना है कि हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के इंटरव्यू मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर दिखाए गए. कोई भी इसे आसानी से समझ सकता है कि वे पत्रकारों के इंटरव्यू नहीं थे, पीआर इंटरव्यू थे. पहले ऐसे पीआर इंटरव्यू सीमित होते थे, लेकिन अब इनकी संख्या बढ़ती जा रही है. पिछले दो सालों में प्राइवेट सेक्टर पर आर्थिक मंदी की मार पड़ी है. इसलिए अप्रैल-मई 2020 में कुछ नेशनल न्यूजपेपर्स में प्राइवेट सेक्टर एक भी विज्ञापन नहीं था. सिर्फ सरकारी विज्ञापन थे

सेखरी इशारा करते हैं कि किस तरह चुनींदा मीडिया संगठन सरकारी लाइन पर चलकर खूब सारे विज्ञापन बटोर लेते हैं. “OpIndia” जैसे डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म की कोई विश्वसनीयता नहीं है क्योंकि हर दूसरे या तीसरे दिन उसकी खबरों का भंडाफोड़ किया जाता है. फिर भी OpIndia के पास पिछले तीन-चार महीने से योगी आदित्यनाथ का विज्ञापन बैनर है. टैक्सपेयर का पैसा इन मीडिया प्लेटफॉर्म्स को फंड कर रहा है, जोकि किसी भी पारदर्शी समाज में स्वीकार करने लायक नहीं है.

इसका, एक ही हल है, पारदर्शिता, यानी साफ और खरी बात, सरकार कहते हैं, थोड़ी पारदर्शिता रखने से चतुर चालाक लोगों की घिग्घी बंध जाएगी.

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