बीजेपी ने इस मुद्दे को लपक लिया है और इस पर बेहद आक्रामक मुद्रा में है

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के अपनी पारंपरिक सीट भवानीपुर के बजाय नंदीग्राम से चुनाव लड़ने से कई सवाल खड़े हो गए हैं. क्या तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ऐसा इसलिए कर रही हैं कि वे अपनी पारंपरिक सीट पर असुरक्षित हैं जहाँ बीजेपी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है?

क्या मुख्यमंत्री नंदीग्राम से चुनाव लड़ कर बीजेपी के शुभेंदु अधिकारी को उनकी अपनी ही सीट पर उलझाए रखना चाहती हैं ताकि वे दूसरी जगह कोई नुक़सान न कर सकें? क्या तृणमूल कांग्रेस की रणनीति काडर में भरोसा का संचार करना है ताकि वे बीजेपी की चुनौती का डट कर सामना करें?  बीजेपी ने इस मुद्दे को लपक लिया है और इस पर बेहद आक्रामक मुद्रा में है. वह इसे इस रूप में प्रचारित कर रही है कि मुख्यमंत्री ने अपना निर्वाचन क्षेत्र बदल कर चुनाव से पहले ही हार मान ली है.

किसी समय ममता बनर्जी के नज़दीकी रहे शुभेंदु अधिकारी ने जब तृणमूल कांग्रेस छोड़ी और बीजेपी का दामन थामा तो उन्होंने चुनौती देते हुए कहा था कि ममता बनर्जी उनके क्षेत्र नंदीग्राम से चुनाव लड़ कर देखें, उन्हें 50 हज़ार वोटों के अंतर से नहीं हरा पाएंगे तो राजनीति ही छोड़ देंगे.गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा था कि ममता बनर्जी को नंदीग्राम से ही लड़ना चाहिए. अब जब ममता बनर्जी नंदीग्राम से चुनाव लड़ रही हैं तो बीजेपी ने इसे उनकी हार बताना शुरू कर दिया है.

पहले ही हार मान ली?

बीजेपी की इस आक्रामकता को पश्चिम बंगाल बीजेपी के सह-प्रभारी और आईट सेल के प्रमुख अमित मालवीय के ट्वीट से समझा जा सकता है. उन्होंने कहा, भवानीपुर की सीट को छोड़ कर ममता बनर्जी ने पहला वोट पड़ने से भी पहले अपनी हार मान ली है. बंगाल बदलाव के लिए तैयार है. बीजेपी ने हमला और तेज कर दिया है. मालवीय ने ट्वीट किया, यदि तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख अपने पारंपरिक सीट पर जीत को लेकर निश्चिंत नहीं हैं तो इसका कारण यह है कि वे सरकार के ख़िलाफ़ चल रही हवा को भाँप चुकी हैं.

भवानीपुर का समीकरण

भवानीपुर का इलाक़ा मिश्रित आबादी वाला है जहाँ बिहार-उत्तर प्रदेश के प्रवासी बड़ी तादाद में रहते हैं. पहले भी ममता बनर्जी को इन हिंदीभाषी प्रवासियों का एकमुश्त वोट नहीं मिलता था. उन पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी यानी सीपीआईएम का प्रभाव था. लेकिन समय के साथ साथ इन वोटरों का वोटिंग पैटर्न बदला. ये जिन जगहों यानी बिहार और उत्तर प्रदेश से आए हैं, वहाँ की बदलती राजनीति से अछूते नहीं रह सकते. लिहाज़ा, उनके बीच बीजेपी का प्रभाव बढ़ने लगा. नतीजा यह हुआ कि भवानीपुर से ममता बनर्जी जीतती तो रही हैं, पर उनकी जीत का अंतर लगातार कम होता रहा है.

विधानसभा चुनाव 2016 में ममता बनर्जी ने कांग्रेस की दीपा दासमुंशी को 25,301 वोटों से हराया. मुख्यमंत्री को 65,520 वोट मिले जबकि कांग्रेस उम्मीदवार को 40,219 वोटों से संतोष करना पड़ा. बीजेपी के चंद्र कुमार बोस को 26,219 वोट मिले थे. बोस नेताजी सुभाष चंद्र बोस के भाई के पोते हैं. पश्चिम बंगाल बीजेपी ने यह चुनाव नेताजी के नाम पर लड़ा था. वह नेताजी के पोते को बड़े उलटफेर की उम्मीद से पार्टी में लेकर आई थी और सीधे मुख्यमंत्री से भिड़ा दिया था.

साल 2011 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के सुब्रत बख्शी ने यह सीट 49,936 वोटों के अंतर से जीता था. उन्हें 87,903 वोट मिले था जबकि दूसरे नंबर पर आए सीपीआईएम के नारायण प्रसाद जैन को 37,967 वोट मिले थे. बीजेपी के उम्मीदवार राम चंद्र जायसवाल को सिर्फ 5,078 वोट हासिल हुए थे.

उसी साल उस सीट पर हुए उपचुनाव में ममता बनर्जी को 73,635 वोट हासिल हुए थे जबकि सीपीआईएम की नंदिनी नंदिनी मुखर्जी को 19,422 वोट ही मिले थे. यानी 2011, 2016 के विधानसभा चुनाव और 2016 के ही उपचुनाव में भवानीपुर में तृणमूल की स्थिति मजबूत थी और ममता बनर्जी के बदले किसी और (सुब्रत बख्शी) के चुनाव लड़ने पर भी मतदाताओं ने उसे वोट दिया था.

लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 में बीजेपी की स्थिति इतनी अच्छी नहीं रही. उस चुनाव में भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र से टीएमसी को सिर्फ 3,158 वोटों की बढ़त मिली थी. जिस वार्ड 73 में खुद ममता रहती है, वहां बीजेपी को 496 वोटों की बढ़त मिली थी. यह वह लोकसभा चुनाव था, जिसमें बीजेपी को पश्चिम बंगाल से 18 सीटें मिली थीं. पश्चिम बंगाल बीजेपी के उत्साह का मुख्य कारण यही है. लेकिन यह भी सच है कि इस चुनाव में 17 मंत्रियों के विधानसभा क्षेत्रों से टीएमसी बीजेपी से पिछड़ गई थी.

लेकिन बीजेपी ने इसके पहले यानी 2014 के लोकसभा चुनाव में ममता बनर्जी को पहली बार चौंकाया था, जब उनके विधानसभा क्षेत्र से उसने 176 वोटों की बढ़त ले ली थी. हालांकि लोकसभा चुनाव का वोटिंग पैटर्न विधानसभा चुनावों से अलग होता है, पर यदि हम लोकसभा चुनाव 2019 को भी जोड़ लें तो साफ है कि बीजेपी की मौजूदगी बढ़ी है.

2016 के विधानसभा चुनाव में भले ही नेताजी के नाम पर मिले हों लेकिन उसे 26 हज़ार से ज्यादा वोट मिले जो कुल पड़े वोटों के 19 प्रतिशत से थोड़ा ज़्यादा है. बीजेपी के बढ़ते पदचाप को साफ सुना जा सकता है. क्या ममता बनर्जी ने बीजेपी के इस पदचाप को सुन कर भवानीपुर छोड़ने का फ़ैसला किया या शुभेंदु अधिकारी के प्रभाव को सीमित करने और अपने काडर में उत्साह भरने के लिए नंदीग्राम का रुख किया.

मेदिनीपुर की 34 सीटों पर नज़र

पूर्व मेदिनीपुर और पश्चिमी मेदिनीपुर में कुल मिला कर 34 विधानसभा सीटें हैं. बीजेपी का यह मानना रहा है कि शुभेंदु अधिकारी की वजह से दोनों ज़िलों पर उसका कब्जा हो जाएगा और इस तरह 34 विधानसभा सीट उसकी झोली में आ गिरेंगी. बीजेपी के इस सोच के पीछे यह सच्चाई है कि दिव्येंदु और शिशिर अधिकारी के रूप में दो लोकसभा सीटें उसके हाथ लग जाएंगी.

पूर्व मेदिनीपुर ज़िले के 19 और पश्चिमी मेदिनीपुर ज़िल के 16 विधानसभा क्षेत्रों में, सब पर तृणमूल कांग्रेस का कब्जा है. वहाँ कुछ जगहों पर सीपीआईएम तो कहीं कहीं कांग्रेस दूसरे नंबर पर है. बीजेपी बहुत पीछे है. सवाल यह है कि क्या शुभेंदु अधिकारी के नाम पर इन 34 क्षेत्रों के मतदाता टीएमसी के बदले बीजेपी को वोट देंगे. बीजेपी का यही आकलन है.

हालांकि शुभेंदु अधिकारी इलाक़े में लोकप्रिय हैं, पर दिक्क़त यह है कि वह दीदी के नज़दीक होने और सरकार से कह कर काम कराने के लिए लोकप्रिय हैं. लेकिन अब जबकि खुद दीदी उनके खिलाफ़ लोगों के बीच पहुँच रही हैं तो बीजेपी को लोग वोट देंगे या नहीं, मामला यह है. इस पर अभी कुछ कहना मुश्किल है. पर यह तो है ही कि ममता बनर्जी ने खुद नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का एलान कर पासा पलट दिया है.

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