जाट राजनीति में उबाल, मुसीबत में बीजेपी

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दिल्ली के बॉर्डर्स पर चल रहे किसानों के आंदोलन ने देश की जाट राजनीति में उबाल ला दिया है. लगभग सभी जाट नेता किसान परिवार से संबंध रखते हैं और सियासत में आने के बाद भी किसानों के मुद्दों पर आवाज़ उठाते रहे हैं. या यूं कहें कि सियासत करने के लिए उन्हें किसानों के साथ खड़े होना ज़रूरी होता है, इसलिए वे ख़ुद को किसान पुत्र भी बताते हैं.

किसान आंदोलन ने जाट समुदाय में फिर से राजनीतिक चेतना को जगाया है. दिल्ली के तमाम बॉर्डर्स पर चल रहे किसानों के आंदोलन को आप देखेंगे तो यहां सिख और हिंदू जाटों के साथ ही मुसलिम जाटों की भी भागीदारी देखने को मिलेगी. पहले यह बात समझनी ज़रूरी है कि जाट जमींदार कौम है यानी जिसके पास ज़मीन है. कुछ और जातियां भी जमींदार हैं लेकिन जाटों के पास ज़मीन ज़्यादा है इसलिए किसान आंदोलन में इनका प्रभाव ज़्यादा है.

जाट समुदाय के लोग सेना और सरकारी नौकरियों में भी हैं लेकिन किसानी से बड़ी संख्या में जुड़े हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली के बाहरी इलाक़ों, हरियाणा, पंजाब और राजस्थान के कुछ इलाक़ों तक इस समुदाय का खासा असर है और इस समुदाय के नेता राजनीतिक दलों से लेकर किसान यूनियनों के जरिये राजनीति करते हैं. बात शुरू करते हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश से क्योंकि यहीं से किसानों के सबसे बड़े नेता महेंद्र सिंह टिकैत निकले. चूंकि वह जाट समुदाय से आते थे, इसलिए जाटों की बड़ी आबादी उनकी हुक्के की गुड़गुड़ाहट पर इकट्ठा हो जाती थी.

उनकी विरासत को संभाल रहे उनके बेटे राकेश और नरेश टिकैत किसान आंदोलन में खासे सक्रिय हैं. इनमें भी राकेश टिकैत के पक्ष में जिस तरह पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उबाल आया है, उससे साफ पता चलता है कि उनके भावुक होने का असर जाटों के बीच हुआ है.

एकजुट हो रहा जाट समुदाय

राकेश टिकैत से सबसे पहले मिलने जो लोग ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पहुंचे, उनमें पूर्व सांसद जयंत चौधरी प्रमुख थे. जयंत देश के पूर्व प्रधानमंत्री और जाटों के सबसे बड़े नेता रहे चौधरी चरण सिंह के पोते हैं. जयंत के पिता चौधरी अजित सिंह का भी राजनीतिक आधार पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही रहा है और यहां जाट समुदाय इनके साथ खड़ा रहा है. हालांकि इस इलाके में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद दोनों को हार का सामना करना पड़ा लेकिन किसान आंदोलन ने जाटों को छोटे चौधरी यानी अजित सिंह के पक्ष में एकजुट किया है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हो रही किसानों की महापंचायतों में जंयत चौधरी लगातार पहुंच रहे हैं. महापंचायतों में उमड़ रही भीड़ साफ बता रही है कि जाटों की नाराज़गी बीजेपी को भारी पड़ सकती है.

बीजेपी नेताओं की मुश्किलें

पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बीजेपी से जुड़े जाट नेता जैसे- केंद्रीय मंत्री संजीव बालियान, बाग़पत के सांसद सत्यपाल सिंह और तमाम छोटे-बड़े नेता जानते हैं कि किसान आंदोलन ने जाट समुदाय को इकट्ठा कर दिया है और अगर यह आंदोलन लंबा चलता है तो उनके सियासी करियर के लिए मुश्किल खड़ी हो जाएगी. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जाटों की आबादी 17 फ़ीसदी के आसपास है. ग़ाज़ियाबाद से लेकर मेरठ, बाग़पत, शामली और बिजनौर-सहारनपुर से लेकर अमरोहा तक यह समुदाय ख़ासा असर रखता है. यहां की 10 लोकसभा सीटों और लगभग 70 विधानसभा सीटों में यह समुदाय निर्णायक स्थिति में है.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से अब आगे बढ़ते हैं हरियाणा की ओर. हरियाणा में जाटों की आबादी 25 फ़ीसदी है. हरियाणा में लंबे वक्त तक जाट नेता ही मुख्यमंत्री बनते रहे हैं. चौधरी देवीलाल किसान नेता होने के साथ ही जाट नेता भी थे और देश के उप प्रधानमंत्री भी बने. उनकी विरासत संभाल रहे अभय चौटाला नेता प्रतिपक्ष रहे हैं जबकि पोते दुष्यंत चौटाला उप मुख्यमंत्री हैं. बीजेपी के साथ सरकार में शामिल होने के कारण दुष्यंत चौटाला लगातार किसानों के निशाने पर हैं. जबकि उनके चाचा अभय चौटाला विधानसभा से इस्तीफ़ा देकर सियासी बढ़त हासिल कर चुके हैं.

टिकरी बॉर्डर पर चल रहे किसान आंदोलन में जाट युवाओं की जबरदस्त सक्रियता है. हरियाणा बीजेपी के अध्यक्ष ओम प्रकाश धनखड़ जाट समुदाय से ही आते हैं. लेकिन धनखड़, दुष्यंत चौटाला सहित बाक़ी जाट नेता जानते हैं कि उनके समुदाय की नाराज़गी का उनकी सियासत पर कितना असर हो सकता है. हरियाणा की लगभग सभी लोकसभा सीटों और विधानसभा सीटों पर जाट समुदाय का अच्छा असर है. जाट आरक्षण को लेकर हरियाणा में लंबे वक़्त तक बवाल हो चुका है.

राकेश टिकैत के समर्थन में हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के बेटे और राज्यसभा सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा भी पहुंचे थे. हुड्डा भी जाट समुदाय से आते हैं और ऐसे में दीपेंद्र ने ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर पहुंचकर यह संदेश देने की कोशिश की थी किसान और जाट कौम उनके साथ खड़ी है. अभय चौटाला भी ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पहुंचे थे और टिकैत के साथ खड़े होने का भरोसा दिलाया था. राजस्थान में जाट सबसे बड़ी आबादी वाला समुदाय है. यहां जाटों की आबादी 10 फ़ीसदी के आसपास है.

किसान आंदोलन में जाट समुदाय की भागीदारी को देखने के बाद नागौर के सांसद हनुमान बेनीवाल ने बीजेपी के साथ खड़े होना ख़तरे का सौदा समझा और एनडीए से बाहर निकल आए. बेनीवाल किसानों के समर्थन में बीते कई दिनों से धरने पर बैठे हैं. राजस्थान की 200 विधानसभा सीटों में से 100 सीटों के आसपास जाट समुदाय का असर माना जाता है. प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा इसी समुदाय से हैं.

पंजाब में सिख जाटों का असर

पंजाब में सिख जाटों की आबादी 22 से 25 फ़ीसदी है. अधिकतर मुख्यमंत्री इस समुदाय से रहे हैं और वर्तमान मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और पूर्व मुख्यमंत्री और सिख राजनीति के बड़े चेहरे सरदार प्रकाश सिंह बादल भी इस समुदाय से हैं. सिंघु बॉर्डर पर चल रहे किसानों के आंदोलन में सिख जाटों की बड़ी तादाद है. पंजाब की राजनीति में सिख जाट हावी हैं. यहां दिल्ली का जिक्र करना ज़रूरी होगा. दिल्ली देखने में शहर लगती है लेकिन द्वारका से लेकर पालम, महरौली, नज़फगढ़, बिजवासन, मुंडका, नांगलोई, नरेला, बवाना तक इस समुदाय के गांव हैं.

इन गांवों में जाट किसान संगठनों और राजनीतिक दलों से जुड़े हैं. दिल्ली में जाट समुदाय के 200 से ज़्यादा गांव हैं और इस समुदाय से आने वाले साहिब सिंह वर्मा मुख्यमंत्री रह चुके हैं. उनके बेटे प्रवेश साहिब सिंह दो बार सांसद रह चुके हैं और दोनों बार 5 लाख से ज़्यादा मतों से जीते हैं. दिल्ली के नगर निगमों की स्थायी समितियों में जाट नेताओं की भरमार है. जयंत चौधरी, दीपेंद्र सिंह हुड्डा, दुष्यंत चौटाला, प्रवेश साहिब सिंह वर्मा और महेंद्र सिंह टिकैत के पोते गौरव टिकैत जाट राजनीति के युवा चेहरे हैं.

किसान आंदोलन के जरिये जाट समुदाय का बीजेपी से कटना निश्चित रूप से उसके लिए मुश्किल खड़ी करेगा क्योंकि अधिकतर जाट नेता विरोधी दलों में हैं और इससे बीजेपी के सियासी आधार में सेंध ज़रूर लगेगी. कुल मिलाकर जाट समुदाय ने किसान आंदोलन के जरिये अपनी राजनीतिक ताक़त दिखाने की कोशिश की है. जाटों ने सरकार तक संदेश पहुंचाया है कि दिल्ली के चारों ओर बैठे उनके समुदाय के लोगों से टक्कर लेना आसान नहीं है. देखना होगा कि किसान आंदोलन से क्या जाट समुदाय से चौधरी चरण सिंह या चौधरी देवीलाल जैसा कोई बड़े क़द का नेता निकलता है या नहीं.

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