सुखपाल खैरा को वापस लाकर अमरिंदर सिंह ने संभवत: एक तीर से दो निशाने साधे हैं

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Amrinder_Singh-Sukhpal-Khaira

पंजाब की राजनीति में यद्यपि कुछ लोग इस घर वापसी या पूर्व दलबदलू के कांग्रेस में लौटने पर सार्वजनिक तौर पर चर्चा कर रहे हैं. लेकिन इस माह के शुरू में मुख्यमंत्री अमिरंदर सिंह द्वारा कांग्रेस में वापस लाए जाने के बाद से पंजाब विधानसभा में विपक्ष के पूर्व नेता सुखपाल सिंह खैरा ने राज्य के राजनीतिक गलियारों में हलचल मचा रखी है.

पार्टी आलाकमान की तरफ से विरोधियों का साथ दिए जाने के कारण अलग-थलग पड़ते नज़र आ रहे 79 वर्षीय मुख्यमंत्री ने वह किया जो कई लोगों के लिए अकल्पनीय तो नहीं था लेकिन अप्रत्याशित जरूर था-पंजाब की राजनीति में कभी आम आदमी पार्टी (आप) का चेहरा रहे खैरा को कांग्रेस में वापस लाना और मुख्यमंत्री के इस कदम को आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय मानने की कई वजहें हैं.

खैरा ने अतीत में कैप्टन अमरिंदर सिंह पर जबर्दस्त हमले किए हैं, उनकी निजी जिंदगी पर राजनीतिक कीचड़ उछालने में भी पीछे नहीं रहे हैं. आप विधायक के तौर पर वह एक मंत्री के इस्तीफे के लिए जिम्मेदार रहे हैं, जिससे मुख्यमंत्री के लिए शर्मिंदगी की स्थिति खड़ी हो गई थी. प्रवर्तन निदेशालय ने गत मार्च में कथित ड्रग तस्करी कांड में खैरा के परिसरों पर छापा मारा था और उन्होंने सिखों के अलगाववादी संगठन सिख फॉर जस्टिस (एसजेएफ) की ओर से प्रस्तावित रेफरेंडम 2020 का भी समर्थन किया था.

फिर भी कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कांग्रेस आलाकमान द्वारा नियुक्त एक समिति, जिसका गठन उनके नवजोत सिद्धू की अगुआई वाले असंतुष्टों की शिकायतों पर गौर करने के लिए किया गया है, के समक्ष बयान देने के लिए दिल्ली रवाना होने से पहले दो आप विधायकों के साथ कांग्रेस में उनकी वापसी का स्वागत किया. तो, क्या यही वजह है कि कैप्टन अपने ऐसे आलोचक का समर्थन हासिल करना चाहते थे, जिसने करीब पांच साल पहले एक प्रेस कांफ्रेंस में उनके बारे में अपमानजनक टिप्पणी की थी? कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पंजाब के मुख्यमंत्री ने एक तीर से दो शिकार किए हैं.

कपूरथला के भोलाथ निर्वाचन क्षेत्र में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (एसजीपीसी) की प्रमुख बीबी जागीर कौर को इससे कड़ी चुनौती मिलेगी और अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों में अपनी किस्मत चमकाने के आप के प्रयासों की धार भी कुंद हो जाएगी. भोलाथ पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (एसएडी) के मजबूत गढ़ों में से एक है, जिस निर्वाचन क्षेत्र में पिछले नौ विधानसभा चुनावों में से छह में पार्टी ने जीत हासिल की है. खैरा और बीबी जागीर कौर के बीच 1997 से अब तक पांच बार चुनावी टक्कर हो चुकी है, जिसमें 2017 की वह चुनावी जंग भी शामिल है जब एसएडी ने उनके दामाद भूपिंदर सिंह को मैदान में उतारा था.

खैरा ने यहां पहली बार 2007 में कांग्रेस उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की थी और 2017 में बतौर आप प्रत्याशी जीते थे. अगले चुनाव के लिए वह कांग्रेस का एक बेहतरीन दांव हैं. कांग्रेस नेताओं के मुताबिक, भोलाथ निर्वाचन क्षेत्र में केवल खैरा ही बीबी जागीर कौर को कड़ी टक्कर दे सकते हैं. राज्य सरकार के एक अधिकारी ने कहा, उन्हें वहां पर व्यापक समर्थन हासिल है और पंजाब कांग्रेस अभी इसका बेहतर फायदा उठा सकती है. कांग्रेस के लिए खैरा की वापसी इसलिए और भी ज्यादा अहमियत रखती है क्योंकि वह कभी आप का चेहरा थे, जिसने 2017 के चुनावों में एसएडी को पीछे छोड़कर प्रमुख विपक्षी दल का स्थान हासिल कर लिया था.

हालांकि, खैरा ने जनवरी 2019 में पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था और खुद अपना संगठन पंजाब एकता पार्टी का गठन कर लिया था, जिसका अब कांग्रेस में विलय हो चुका है. लेकिन उनकी कांग्रेस में वापसी ने आम आदमी पार्टी के फिर से मजबूती से उभरने की संभावनाओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं. पंजाब कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि इस हफ्ते के शुरू में आप प्रमुख अरविंद केजरीवाल का पंजाब दौरा अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं का घटता मनोबल बढ़ाने का एक हताशा भरा प्रयास था क्योंकि खैरा ने अपने साथ पार्टी के दो विधायकों को भी कांग्रेस में शामिल करा दिया है.

लंबा रास्ता तय करना बाकी

हालांकि, कांग्रेस से जुड़े सूत्रों और यहां तक कि सुखपाल खैरा के करीबियों का मानना है कि उनके पार्टी में लौटने के फैसले से बहुत कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है. उनका कहना है कि, यह वही व्यक्ति हैं जिन्होंने 2017 में विपक्ष के नेता के तौर पर कैप्टन अमरिंदर सिंह पर हमला बोला था और यहां तक कि उनके निजी जीवन को भी राजनीति के अखाड़े में घसीटा था. सबसे ज्यादा हलचल मची थी उस असंसदीय भाषा को लेकर जो खैरा ने मुख्यमंत्री के खिलाफ इस्तेमाल की थी, जब वह अमरिंदर की एक पाकिस्तानी पत्रकार मित्र का जिक्र कर रहे थे. वह तब भी नहीं रुके जब उनके तत्कालीन साथी आप विधायक कंवर संधू और अमन अरोड़ा ने प्रेस कांफ्रेंस में पार्टी की महिला विधायकों की मौजूदगी का हवाला देते हुए उन्हें अपनी भाषा संयत रखने के लिए समझाने की कोशिश की.

तब उन्होंने कहा था, मुझे जो महसूस हो रहा है, वो कहने दो. मैं बेकार की बातें नहीं कर रहा. केवल तथ्य बता रहा हूं. खैरा का कहना है कि, प्रेस कांफ्रेंस के दौरान गुस्से में कुछ ज्यादा ही बोल गए थे. उन्होंने कहा, मैं इस बात से इनकार नहीं करता कि मैंने उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री के प्रति अपशब्दों का इस्तेमाल किया था, लेकिन यह नाराजगी का नतीजा था क्योंकि मुझे एनडीपीएस (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट) के झूठे मामले में फंसाया गया था. मैं भी इंसान हूं और कोई गलती न होने पर गुस्सा आता है.

उन्होंने कहा कि, कांग्रेस में उनकी वापसी पर बात चल रही थी और यहां तक कि 2017 के पंजाब चुनावों से पहले भी राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने उनसे मुलाकात की थी और उनसे कांग्रेस में लौटने को कहा था. खैरा ने कहा कि, जब वह (प्रशांत किशोर) मुझसे मिले तो पार्टी आलाकमान फोन कॉल पर ही थे और मुझे यहां तक कहा गया कि कैबिनेट मंत्री का पद दिया जाएगा. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया क्योंकि चुनाव एकदम नजदीक होने के दौरान आप को छोड़ना ठीक नहीं था. कांग्रेस के कुछ नेताओं का कहना है कि खैरा के शामिल होने से पार्टी को मजबूती मिलेगी. प्रस्ताव कैप्टन अमरिंदर की तरफ से भेजा गया था. क्योंकि पार्टी को पता है कि खैरा को एनआरआई का समर्थन हासिल है और वह मुद्दों पर बेबाकी से अपनी राय रखते हैं. हर पार्टी को ऐसे लोगों की जरूरत होती है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि खैरा की वापसी मुख्यमंत्री की जीत है.

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