पंजाब कांग्रेस में घमासान

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Amarinder-Singh

पंजाब कांग्रेस में बीते 2 महीने से चल रहा घमासान शिख़र पर पहुंच गया है. राज्य कांग्रेस में बिगड़ते हालात को देखकर हाईकमान सक्रिय हो गया है और उसने तीन सदस्यों की एक कमेटी को सभी की बात सुनकर रिपोर्ट देने के लिए कहा है.

लेकिन विधानसभा चुनाव से 8 महीने पहले शुरू हुए इस घमासान से पार्टी को चुनाव में सियासी नुक़सान होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता. इसके अलावा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को बदलने या दो कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने की भी चर्चा सियासी गलियारों में है.

कुल 25 विधायक-मंत्रियों को दिल्ली बुलाया गया है और हाईकमान की ओर से बनाई गई तीन सदस्यों की कमेटी इस मामले में उनसे बात कर रही है. बताया गया है कि विधायकों से एक-एक करके बात की जा रही है. कमेटी में मल्लिकार्जुन खड़गे, कांग्रेस महासचिव और पंजाब मामलों के प्रभारी हरीश रावत और दिल्ली कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष और पुराने नेता जय प्रकाश अग्रवाल शामिल हैं.

विधायकों के अलावा पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष सुनील जाखड़ भी दिल्ली पहुंचे हैं और कुछ सांसद भी. इसके बाद यह कमेटी मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह और पूर्व मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू से भी बातचीत करेगी और अपनी रिपोर्ट पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को सौंपेगी. 79 साल के अमरिंदर सिंह की सियासी ख़्वाहिश एक बार और पंजाब का मुख्यमंत्री बनने की है. लेकिन उनके अपने ही साथी इसमें रोड़ा बनते नज़र आ रहे हैं.

अमरिंदर के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ रहे सिद्धू अकेले नहीं हैं बल्कि प्रदेश कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष प्रताप सिंह बाजवा, जेल मंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे चुके सुखजिंदर सिंह रंधावा, कैबिनेट मंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, विधायक परगट सिंह और सुरजीत सिंह धीमान भी हैं. इनके साथ लुधियाना के सांसद रवनीत सिंह बिट्टू का भी समर्थन है, ऐसी भी चर्चा है.

देखना होगा कि कमेटी में शामिल कांग्रेस नेता इस विवाद का हल कैसे निकालते हैं लेकिन पंजाब कांग्रेस में यह झगड़ा इतना ज़्यादा बढ़ चुका है कि अगर इसे नहीं सुलझाया गया तो चुनाव से पहले पार्टी की राज्य इकाई में दो फाड़ होना तय माना जा रहा है. क्योंकि प्रताप सिंह बाजवा अपनी मांगों को लेकर मुख्यमंत्री को 45 दिन का वक़्त दे चुके हैं और उसके बाद कोई फ़ैसला करने की बात उन्होंने कही है.

दूसरी ओर अमरिंदर सिंह की कैबिनेट के सात मंत्री खुलकर कह चुके हैं कि पार्टी हाईकमान को सिद्धू के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए. अमरिंदर सरकार द्वारा सिद्धू के ख़िलाफ़ विजिलेंस विभाग द्वारा जांच तेज़ करने के बाद से पंजाब कांग्रेस में लगी इस आग में घी पड़ गया है. माना जा रहा है कि सिद्धू को अमरिंदर सिंह की ओर से माकूल जवाब दिया गया है.

एक चर्चा प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष को बदलने या दो कार्यकारी अध्यक्ष बनाने की भी है. चुनाव से ठीक पहले अध्यक्ष को बदला जाना ठीक नहीं होगा. अमरिंदर सिंह साफ कह चुके हैं कि साढ़े चार साल पहले पार्टी में आए नवजोत सिंह सिद्धू को अध्यक्ष नहीं बनाया जा सकता. ऐसे में किसी हिंदू नेता की तलाश की जा रही है या फिर जाखड़ को पद पर बनाए रखते हुए दो कार्यकारी अध्यक्ष बनाने पर भी विचार चल रहा है, इसमें हिंदू और सिख समुदाय को एक-एक पद दिया जा सकता है.

कैसे शुरू हुआ झगड़ा?

ये सारा झगड़ा 2015 में गुरू ग्रंथ साहिब के बेअदबी मामले से जुड़े कोटकपुरा गोलीकांड में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के द्वारा पंजाब एसआईटी की रिपोर्ट को रद्द किए जाने के बाद से शुरू हुआ है. हालांकि अमरिंदर सरकार ने नई एसआईटी बनाई और इससे छह महीने में रिपोर्ट देने के लिए कहा लेकिन पंजाब सरकार में पूर्व मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने कैप्टन अमरिंदर सिंह के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया.

सिद्धू का कहना है कि अमरिंदर सिंह ने बेअदबी मामले में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल और उनके परिवार को बचाने की पूरी कोशिश की है और इस वजह से 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान पंजाब में जनता से किया गया वादा भी पूरा नहीं हो सकेगा. गौरतलब है कि 2017 के विधानसभा चुनाव के दौरान कैप्टन अमरिंदर सिंह चुनावी सभाओं में वादा करते थे कि वे सत्ता में आने पर इस मामले में प्रकाश सिंह बादल और उनके परिवार के ख़िलाफ़ कार्रवाई करेंगे लेकिन अब साढ़े चार साल के बाद भी मामले में कुछ नहीं हुआ है और सिद्धू व कुछ अन्य कांग्रेस नेताओं ने इसे मुद्दा बना लिया है.

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