ग़लत मौक़े पर सही कार्रवाई?

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चुनावों के दौरान सत्तारुढ़ और विपक्षी दलों के बीच भयंकर कटुता का माहौल तो अक्सर हो ही जाता है लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों में हमारी राजनीति का स्तर काफ़ी नीचे गिरता नज़र आ रहा है.

केंद्र सरकार के आयकर-विभाग ने तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर छापे मार दिए हैं और उनमें से कुछ को गिरफ्तार भी कर लिया है. तृणमूल के ये नेतागण शारदा घोटाले में पहले ही कुख्यात हो चुके थे.

इन पर मुकदमे भी चल रहे हैं और इन्हें पार्टी-निकाला भी दे दिया गया था लेकिन चुनावों के दौरान इनको लेकर ख़बरें उछलवाने का उद्देश्य क्या है? क्या यह नहीं कि अपने विरोधियों को जैस-तैसे भी बदनाम करवाकर चुनाव में हरवाना है? यह पैंतरा सिर्फ़ बंगाल में ही नहीं मारा जा रहा है, कई अन्य प्रदेशों में भी इसे आजमाया गया है. अपने विरोधियों को तंग और बदनाम करने के लिए सीबीआई और आयकर विभाग को डटा दिया जाता है.

इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं. बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे की पत्नी रुचिरा और उनके दूसरे कुछ रिश्तेदारों में एक कोयला-घोटाले के बारे में पूछताछ चल रही है और चिट-फंड के मामले में दो अन्य मंत्रियों के नाम बार-बार प्रचारित किए जा रहे हैं. इन लोगों ने यदि ग़ैर-क़ानूनी काम किए हैं और भ्रष्टाचार किया है तो इनके ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई ज़रूर की जानी चाहिए लेकिन चुनाव के दौरान की गई सही कार्रवाई के पीछे भी दुराशय ही दिखाई पड़ता है.

इस दुराशय को पुष्ट करने के लिए विपक्षी दल अन्य कई उदाहरण भी पेश करते हैं. जैसे जब 2018 में आंध्र में चुनाव हो रहे थे, तब टीडीपी के सांसद वाय.एस. चौधरी के यहाँ छापे मारे गए. अगले चुनाव में चौधरी भाजपा में आ गए. कर्नाटक के प्रसिद्ध कांग्रेसी नेता शिवकुमार के यहाँ भी 2017 में दर्जनों छापे मारे गए. उन दिनों वे अहमद पटेल को राज्यसभा चुनाव में जिताने के लिए गुजराती विधायकों की मेहमाननवाजी कर रहे थे.

पिछले दिनों जब राजस्थान की कांग्रेस संकटग्रस्त हो गई थीं, केंद्र सरकार ने कांग्रेसी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के भाई और मित्रों पर छापे मार दिए थे. लगभग यही रंग-ढंग हम केरल के कम्युनिस्ट और कांग्रेसी नेताओं के ख़िलाफ़ इन चुनावों में देख रहे हैं. कई तमिल नेता और उनके रिश्तेदारों को सरकारी एजेंसियाँ तंग कर रही हैं.

द्रमुक पार्टी ने बीजेपी पर खुलकर आरोप भी लगाया है कि वह अपने गठबंधन को मदद करने के लिए यह सब हथकंडे अपना रही है. पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान मध्य प्रदेश के कांग्रेसी मुख्यमंत्री कमलनाथ के रिश्तेदारों को भी इसी तरह तंग किया गया था.

2018 में प्रादेशिक चुनावों के पहले कांग्रेसी नेता भूपेश बघेल (आजकल मुख्यमंत्री) को भी एक मामले में फंसाने की कोशिश हुई थी. इस तरह के आरोप अन्य प्रदेशों के कई विरोधी नेताओं ने भी लगाए हैं. चुनाव के दौरान की गई ऐसी कार्रवाइयों से आम जनता पर क्या अच्छा असर पड़ता है? शायद नहीं. ग़लत मौक़े पर की गई सही कार्रवाई का असर भी उल्टा ही हो जाता है.

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