भारतीय मीडिया के लिए शर्मनाक घटना

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Rajdeep Sardesai

वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई के साथ जो हुआ वह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. यह बताता है कि हमारे सबसे बड़े मीडिया संस्थानों ने किस तरह घुटने टेक दिए हैं. राजदीप सरदेसाई, मृणाल पांडेय, ज़फ़र आग़ा जैसे वरिष्ठ पत्रकारों समेत सात लोगों पर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और हरियाणा में मामले दर्ज़ किए गए हैं और उन पर राजद्रोह जैसी भयावह धाराएं भी लगाई गई हैं. हालाँकि पहले भी पत्रकारों को इस तरह से घेरा गया है, मगर एक साथ इतने अनुभवी लोगों के ख़िलाफ़ कभी कार्रवाई नहीं की गई थी.

पत्रकारों को धमकाने की मुहिम

ज़ाहिर है सत्ता प्रतिष्ठान में विरोध को लेकर बेचैनी और भी बढ़ती जा रही है. सहिष्णुता तो ख़ैर उसमे पहले से ही नहीं थी. ध्यान रहे जिन राज्यों में मामले दर्ज़ कराए गए हैं वे बीजेपी शासित हैं और जैसा कि अब सर्वविदित है, बीजेपी या संघ परिवार अपनी सरकारों के ख़िलाफ़ बोलने या लिखने वालों को धमकाने, परेशान करने की मुहिम पर है. लेकिन यह नई बात नहीं है. यह न्यू नॉर्मल है. यह सिलसिला पिछले पाँच-छह सालों से चला आ रहा है. 2019 का चुनाव जीतने के बाद से तेज़ ज़रूर हुआ है. मगर चिंता की बात यह है कि मीडिया संस्थान अब पत्रकारों के बचाव से हाथ खींच रहे हैं और सत्ता के सामने पूर्ण समर्पण के लिए तैयार हैं. टीवी टुडे ने केस दर्ज़ होने के पहले ही राजदीप सरदेसाई को निलंबित कर दिया, उन्हें दो हफ़्तों के लिए ऑफ एयर कर दिया और एक महीने का वेतन भी काटने की घोषणा कर दी.

आखिर राजदीप का अपराध क्या है, जिसके लिए उन्हें दंडित किया गया? आरोप है कि 26 जनवरी को उन्होंने एक ट्वीट में लिखा कि पुलिस की गोली से एक किसान नवरीत सिंह की मौत हो गई है. यह ख़बर ग़लत थी, क्योंकि नवरीत सिंह की मौत ट्रैक्टर के पलटने से हुई थी. लेकिन राजदीप ने कोई फ़ेक न्यूज़ नहीं चलाई थी, क्योंकि जिस समय इस मौत की ख़बर आई थी, उस समय यह दुविधा बनी हुई थी की मौत कैसे हुई. बाद में जब ख़बर आई कि मौत गोली चलने से नहीं हुई है तो और भी बहुत से लोगों की तरह राजदीप ने भी अपनी ग़लती को सुधारा और ट्रैक्टर पलटने का वीडियो भी ट्वीट किया.

हालाँकि नवरीत के परिजन आज भी दावा कर रहे हैं कि पुलिस की गोली लगने से मौत हुई. राजदीप जैसे वरिष्ठ पत्रकारों से ये उम्मीद तो की जाती है कि वे कुछ लिखेंगे-बोलेंगे तो जाँच-परखकर, मगर यदि कभी कोई चूक हो जाती है तो उन्हें तुरंत राजद्रोही नहीं बताया जाता. और जब भूल सुधार कर ली जाती है तब तो और नहीं. लेकिन इसे नज़रअंदाज़ कर दिया गया, क्योंकि राजदीप और उनके जैसे दूसरे पत्रकार सरकार विरोधी खेमे के पत्रकार माने जाते हैं और हमेशा निशाने पर रहते हैं.

इसके विपरीत सरकारपरस्त पत्रकार एवं चैनल दिन रात फर्ज़ी ख़बरें दिखाते हैं, दंगे भड़काने वाली बातें करते हैं, तब कहीं कुछ नहीं होता, बल्कि उनकी पीठ ठोंकी जाती है और अगर कोई मुश्किल पड़ जाए तो सरकार तथा अदालतें तक बचाव में तैनात हो जाती हैं. राजदीप जिस संस्थान से जुड़े हैं वहाँ कई ऐसे रिपोर्टर और एंकर हैं जो कई बार इस तरह की ग़लतियाँ कर चुके हैं, उन पर फ़ेक न्यूज़ चलाने के आरोप लगे हैं. साथ ही सांप्रदायिकता से लबरेज़ भाषा में अनाप-शनाप बोलते पकड़े जा चुके हैं, मगर उन्हे कभी उन्हें दंडित नहीं किया. वे उसी तरह प्राइम टाइम में चहकते-चीखते देखे जाते रहे. राजदीप इन सबके मुक़ाबले कहीं ज़्यादा अनुभवी और प्रतिष्ठित पत्रकार हैं, मगर इस सबको अनदेखा करते हुए ऐसे क़दम उठाए गये जो किसी भी स्वाभिमानी पत्रकार के लिए घोर अपमानजनक माना जाता .

दबाव में कार्रवाई?

राजदीप के साथ इतनी सख़्त कार्रवाई स्वविवेक से हुई या किसी दबाव में ये फ़िलहाल रहस्य के घेरे में है. मौजूदा राजनीतिक परिवेश को देखते हुए तो यह बिल्कुल साफ़ दिख रहा है कि या तो यह घबराहट में उठाया गया क़दम था या फिर दबाव में. यह कार्रवाई एफआईआर दर्ज़ किए जाने से पहले की गई. सवाल उठता है कि फिर कौन सा दबाव था, किस बात की घबराहट थी? राजनीतिक दबाव को लेकर टीवी टुडे समेत कई मीडिया घराने लगातार चर्चा में रहे हैं. तक़रीबन दो साल एक साथ कई पत्रकारों की छुट्टियाँ हुयी थी.

पुण्य प्रसून वाजपेयी, मिलिंद खांडेकर और अभिसार शर्मा के इस्तीफ़े या तो लिये गये या फिर उनको इस्तीफ़ा देने के लिये मजबूर किया गया. ये सभी वो पत्रकार हैं जो सत्ता की चमचागिरी के लिये नहीं जाने जाते. पत्रकारों के लिए उनके संस्थान एक बड़े संबल होते हैं. उन्हें यह भरोसा रहता है कि जब कभी सत्ता या दूसरे शक्तिशाली लोग उस पर हमला करेंगे तो वह उनके बचाव में खड़ा होगा. आख़िरकार वह अपनी संपूर्ण निष्ठा, साहस, ज्ञान और समय उसी को देता है. पत्रकारिता का पेशा तलवार की धार पर चलने वाला होता है. इसमें कभी भी किसी से भी कोई चूक हो सकती है या फिर पत्रकारों द्वारा कही या लिखी बात के ग़लत मायने निकालकर उसे निशाने पर लिया जा सकता है.

निजी स्तर पर पत्रकार किसी हमले से निपट पाने में सक्षम नहीं होता. उसे अपने संस्थान की ढाल की ज़रूरत होती है. लेकिन अगर वह इससे मुकर जाए तो फिर पत्रकार अपने पेशे के साथ न्याय नहीं कर सकता. वह सच्ची ख़बरें करने का जोखिम उठाने की स्थिति में ही नहीं रहेगा. दुर्भाग्य की बात यह है कि पत्रकार संगठन भी अब पत्रकारों के बचाव में उस तरह से खड़े नहीं हो पा रहे.

एडिटर्स गिल्ड जैसी संस्थाएं बयान जारी करके या प्रेस कांफ्रेंस करके विरोध तो प्रकट कर देती हैं, मगर उनकी आवाज़ें नक्कारखाने में तूती की तरह होती हैं. उनका कोई असर अब तक सत्तातंत्र में नहीं देखा गया, बल्कि सरकार तो और भी सख़्ती के साथ शिकंजा कसती जा रही है. बहरहाल, गोदी मीडिया अब केंचुआ मीडिया में तब्दील हो गया है. और ऐसे मीडिया से कुछ उम्मीद करना बेमानी होगा.

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