किसान आंदोलन- भंवर में फंसी सरकार

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Narendra-modi

किसानों के आंदोलन से हलकान बीजेपी और मोदी सरकार अब तक इस मसले का कोई हल नहीं निकाल पाए हैं. बीजेपी और मोदी सरकार, दोनों ने कृषि क़ानूनों को किसानों के हित में बताने और इस आंदोलन को एक राज्य का आंदोलन बताने में पूरी ताक़त झोंकी हुई है. तमाम छोटे से बड़े नेता और ख़ुद प्रधानमंत्री तक किसानों के आगे गुहार-मनुहार लगा चुके हैं, सरकार किसानों से धरना ख़त्म करने की अपील कर चुकी है लेकिन किसान सैकड़ों बार साफ कर चुके हैं कि वे इन तीनों क़ानूनों के रद्द होने के बाद ही आंदोलन ख़त्म करेंगे.

आज 25 दिसंबर है. बड़ा दिन होने के साथ ही पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्मदिन भी है और आज एक बार फिर सरकार के सामने आए इस संकट से निपटने के लिए पीएम मोदी कृषि क़ानूनों को लेकर किसानों को संबोधित करेंगे. इसके अलावा सरकार पीएम किसान योजना के तहत 18 हज़ार करोड़ रुपये किसानों के खातों में ट्रांसफ़र करेगी. ये रकम 9 करोड़ से ज़्यादा किसानों के खातों में जाएगी. इस मौक़े पर मोदी वीडियो कॉन्फ्रेन्सिग के जरिये कई राज्यों के किसानों से बात भी करेंगे.

बीजेपी की जोरदार तैयारी

इसके लिए बीजेपी ने बड़े पैमाने पर तैयारियां की हुई हैं. मोदी का भाषण किसानों तक ढंग से पहुंच सके इसके लिए जहां पर किसान इकट्ठा होंगे, वहां बड़ी-बड़ी टीवी स्क्रीन लगाई गई हैं. पार्टी के मुताबिक़, ऐसी 19 हज़ार जगहें हैं, जहां पर ऐसे इंतजाम किए गए हैं. पार्टी का कहना है कि इस कार्यक्रम में 1 करोड़ किसानों की सीधी भागीदारी होगी जबकि 5 करोड़ से ज़्यादा किसान मोदी का भाषण सुनेंगे. मतलब पार्टी ने ब्लॉक स्तर तक इंतजाम किया हुआ है.

बीजेपी महासचिव अरूण सिंह ने कार्यकर्ताओं से कहा है कि वे एपीएमसी की मंडियों या सरकारी मंडियों के बाहर इकट्ठा हों. उनके साथ पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों को भी मौजूद रहने के लिए कहा गया है. बीजेपी और मोदी सरकार अपना पूरा जोर लगा लेना चाहते हैं. क्योंकि अगर मोदी सरकार को झुकना पड़ा तो आने वाले कुछ महीनों में कई राज्यों में चुनाव हैं, वहां ग़लत मैसेज जाएगा. ग़लती से इन राज्यों में खासकर बंगाल में हार मिली तो फिर उससे आगे की चुनावी राह और मुश्किल हो जाएगी.

फिर बातचीत के लिए बुलाया

किसानों को मनाने की सारी कोशिशें कर थक-हार चुकी केंद्र सरकार ने एक बार फिर हिम्मत बांधी है और किसानों को बातचीत के लिए बुलाया है. मोदी सरकार की ओर से गुरूवार को किसान संगठनों को पत्र भेजा गया है. पत्र में कहा गया है कि वे कृषि क़ानूनों को लेकर अगले दौर की बातचीत के लिए तारीख़ और वक़्त तय करें. इससे पहले कई दौर की बातचीत बेनतीजा हो चुकी है.

किसानों को डर है कि नए कृषि क़ानूनों से उनकी ज़मीन कॉरपोरेट्स के पास चली जाएगी. कड़ाके की इस ठंड में जमे किसानों के हौसले बुलंद हैं, ऐसे में वे पीछे हटेंगे ऐसा बिलकुल नहीं दिखता, देखना होगा कि सरकार कब तक इस आंदोलन से लड़ पाती है. टिकरी-सिंघु से लेकर ग़ाजीपुर बॉर्डर तक बड़ी संख्या में इकट्ठा हो चुके किसानों का आंदोलन बढ़ता जा रहा है. देश के दूसरे राज्यों से भी बड़ी संख्या में किसानों ने दिल्ली कूच किया है. रेवाड़ी बॉर्डर पर भी किसानों का धरना जारी है.

विपक्ष ने बढ़ाया दबाव

कृषि क़ानूनों के मसले पर तमाम विपक्षी दलों ने भी केंद्र सरकार पर ख़ासा दबाव बढ़ा दिया है. किसानों की भूख हड़ताल से लेकर भारत बंद तक के कार्यक्रम को विपक्षी दलों का समर्थन मिला है. हालांकि किसानों ने अपने आंदोलन को पूरी तरह ग़ैर राजनीतिक रखा है लेकिन मोदी सरकार से लड़ने में ख़ुद को अक्षम पा रहे विपक्ष को किसान आंदोलन से ऊर्जा मिली है और वह खुलकर किसानों के समर्थन में आगे आया है. सोशल मीडिया पर भी विपक्षी दलों के कारकून खुलकर किसान आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं, ऐसे में बीजेपी के कार्यकर्ताओं को उनसे निपटने में पसीने छूट रहे हैं.

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