हिंदू’ धर्म है या नहीं? क्या है कानून का नज़रिया?

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दक्षिण भारत में कभी हिंदी पर बहस छिड़ जाती है तो कभी ‘हिंदू’ पर. इन दिनों एक बार फिर ‘हिंदुत्व’ या ‘हिंदू धर्म’ को लेकर तमिलनाडु में माहौल अच्छा खासा गर्म है. एक उपदेशक कलाराशि नटराजन के बयान के बाद भाजपा नेताओं ने DMK पर फिर ‘हिंदू विरोधी’ होने का आरोप लगाया. क्योंकि यह बयान द्रविड़ मुनेत्र कषगम के प्रमुख एमके स्टालिन की मौजूदगी में दिया गया.

सियासी विवाद अपनी जगह, लेकिन इस विवाद के चलते दिलचस्पी फिर यह समझने की है कि क्या वाकई ‘हिंदुत्व’ को धर्म कहना ठीक नहीं है? वास्तव में नटराजन ने हाल में एक कार्यक्रम में कहा कि, हिंदुत्व को कोई धर्म नहीं कहा जा सकता, इसका वजूद कुछ ही सदियों पुराना है. हम सब शैव हैं और उससे भी ज़्यादा अहम है कि हम तमिल हैं. यहां गौरतलब यह भी है कि स्टालिन धार्मिक एजेंडे से खुद को अलग करते हुए पहले भी कह चुके हैं कि वो ‘हिंदू विरोधी’ या किसी धर्म के विरोधी नहीं, बल्कि तमिल समाज के पक्ष में रहे हैं. बहरहाल, आइए हिंदुत्व को समझें.

कैसे समझा जाए ‘हिंदुत्व’ को?

लेखकों, इतिहासकारों या प्रसिद्ध नेताओं जैसे विशेषज्ञों के विचारों की तरफ जाएंगे तो बहस काफी लंबी हो सकती है. वर्तमान में अगर इस बहस में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने की मंशा हो तो हम आध्यात्म और धर्म के गुरु की हैसियत रखने वाले किसी व्यक्तित्व के नज़रिये से इसकी व्याख्या समझ सकते हैं. साथ ही देश की न्यायपालिका के शीर्ष स्तंभ यानी सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया जान सकते हैं. तो, पहले हम हिंदुत्व को लेकर मौजूदा समय में प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु और उपदेशक सद्गुरु के विचारों को जानते हैं, जो ईशा फाउंडेशन के संस्थापक हैं. इसके बाद अलग अलग मौकों पर सुप्रीम कोर्ट ने इस बारे में किस तरह का नज़रिया रखा है, उसे जानेंगे.

क्या है हिंदू, कितना पुराना है यह शब्द?

सद्गुरु जग्गी वासुदेव के लेख के हवाले से साफ कहा जा सकता है कि ‘हिंदुत्व’ जैसा शब्द कुछ ही समय पहले से प्रचलन में आया कॉंसेप्ट है. ‘हिंदू’ शब्द भी ​सिंधु से बना. इसका मतलब हर उस व्यक्ति से रहा जो सिंधु भूभाग में जन्मा हो. यह एक सांस्कृति और भौगोलिक पहचान रही. जैसे आप खुद को ‘इंडियन’ कहते हैं, तो यह अंग्रेज़ों के प्रभाव से आपने कुछ ही साल पहले यह शब्द अपनी पहचान बताने के लिए चुना है.

जबकि हिंदू शब्द से पहचान बताने का सिलसिला इससे पुराना है. समझना यह है कि इस शब्द से आप किसी आस्था को ज़ाहिर नहीं करते बल्कि सिर्फ अपनी पैदाइश का इलाका बताते हैं. यानी कुछ सदियों से एक खास भौगोलिक स्थिति में जो संस्कृति फली फूली, उसका प्रतिनिधित्व यह शब्द करता है. दूसरी तरफ, सद्गुरु यह भी कहते हैं कि हिंदू होने का मतलब मूर्तिपूजक होना ही नहीं है. आप किसी देवी देवता की पूजा करते हुए भी हिंदू हो सकते हैं और न करने पर भी. केवल समय के साथ और बाहरी प्रभावों के कारण ऐसा हुआ है कि ‘हिंदू’ शब्द एक भौगोलिक या सांस्कृतिक पहचान के बजाय धार्मिक पहचान बन गया.

सद्गुरु के शब्दों में ‘हिंदू’ कभी कोई ‘वाद’ नहीं रहा. ऐसी कोशिशें इसलिए भी नाकाम होंगी क्योंकि धर्म तो ‘सनातन धर्म’ ही है और यह वो विचार है प्रकृति में सबको अपने भीतर शामिल करता है, किसी को बाहर नहीं करता. हिंदू धर्म नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक आधार पर ‘जीवन जीने का एक तरीका’ है.

क्या रहा सुप्रीम कोर्ट का नज़रिया?

भारत के संविधान में धर्मनिरपेक्षता का सिद्धांत शासन और प्रशासन की नीतियों के लिए आधार है. इसके बावजूद राजनीतिक पार्टियां धार्मिक एजेंडे को हवा देती रही हैं. ‘हिंदुत्व’ या किसी और तरह की सांप्रदायिक चर्चा राजनीतिक स्तर पर जब किसी विवाद की शक्ल लेती रही, तब कोर्ट में मामले पहुंचे और सुप्रीम कोर्ट ने समय समय पर इस बारे में अपनी राय इस तरह रखी. 1966 के शास्त्री यज्ञपुरुषादजी केस में पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने उल्लेखनीय बात कही थी, इतिहास और व्यु​त्पत्ति के सिद्धांत बताते हैं कि ‘हिंदू’ शब्द किस तरह विवादों में घिरा, लेकिन विद्वान सामान्य तौर पर सहमत हैं कि इस शब्द का सीधा संबंध सिंधु नदी से रहा… हिंदू धर्म की व्याख्या करना नामुमकिन न हो तो पेचीदा ज़रूर रहा है. न तो इस धर्म में कोई प्रवर्तक है, न एक भगवान, न एक धर्मसिद्धांत, न एक दार्शनिक विचार और न ही एक तरह की धार्मिक पद्धति या परंपरा. कुल मिलाकर इसे जीने का तरीका माना जा सकता है, और कुछ नहीं.

रमेश यशवंत प्रभु केस में सुप्रीम कोर्ट ने इस सवाल का जवाब दिया था कि क्या ‘हिंदुत्व’ को चुनावी अभियान में इस्तेमाल करना कानून का उल्लंघन है? इसके जवाब में 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ‘हिंदू’ या हिंदुत्व’ शब्द को किसी एक धर्म विशेष से जोड़कर समझना गलतफहमी है. ‘यह शब्द भारत के लोगों की प्रकृति और संस्कृति से जुड़े व्यवहारों के संदर्भ में समझा जाना चाहिए… अगर इस शब्द को सांप्रदायिकता भड़काने के लिए गलत अर्थों में इस्तेमाल किया जाता है, तो भी इस शब्द का वास्तविक अर्थ बदल नहीं जाएगा.

प्रसिद्ध वकील और कानूनविद राम जेठमलानी बता चुके हैं कि सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग साफ कहती है कि ‘हिंदुत्व किसी और संगठित धर्म से नफरत नहीं रखता है और न ही किसी और धर्म से खुद के श्रेष्ठतर होने का दावा करता है. जेठमलानी के मुताबिक यह दुर्भाग्य ही रहा है कि सियासी पार्टियों के एजेंडों के चलते हिंदुत्व को एक सांप्रदायिक शब्द के तौर पर पहचान मिल गई.

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