किस दिशा में देश जा रहा है

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modi ji

नियंत्रणवादी सरकारों की चालों में प्रायः जबर्दस्त समानता होती है. उदाहरण के लिए, शी जिनपिंग ने कहा है कि ‘पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण और केंद्र, सब जगह पार्टी का शासन है.’ मुसोलिनी इससे और भी तीखी बात कह गए हैं, ‘हर चीज राज्यसत्ता के अधीन है, कुछ भी इसके बाहर नहीं है, कुछ भी इसके खिलाफ नहीं है.’ ये निजाम जहां हैं या थे वहां नहीं हैं; और जैसा कि अमेरिका के एक एनजीओ ने बताया है, वह ‘आंशिक तौर पर स्वतंत्र’ है.

लेकिन नरेंद्र मोदी की सरकार प्रभावशाली तथा गतिविधियों के मामले में अब तक स्वायत्त रहे केंद्रों पर जिस तरह ज्यादा से ज्यादा नियंत्रण कायम करने की ख़्वाहिश रखती है उससे जाहिर है कि देश किस दिशा में जा रहा है. कथित सोशल मीडिया के लिए पिछले सप्ताह जो नियम-कायदे जारी किए गए वे इस ख़्वाहिश के सबसे ताजा सबूत हैं.

सोशल मीडिया मंचों का (कहने के लिए) स्वामित्व, नियंत्रण और नियमन करने वाली ग्लोबल टेक कंपनियों पर सरकार के हस्तक्षेप के लिए जगह देने का दबाव है, जिससे लोगों कि प्राइवेसी खतरे में पड़ सकती है. डिजिटल समाचार मीडिया को भी नये नियमों के दायरे में लाने के शुरुआती प्रयासों की बारे में जो खुलासे हुए हैं वे असहमति की आवाज़ों को ‘बेअसर’ करने की मंशा को साफ उजागर करते हैं.

यही नहीं, खेल-कूद और मनोरंजन आदि लोकप्रिय माध्यम भी निशाने पर हैं. क्रिकेट संघों को जिस तरह कब्जे में लिया गया है और देश के सबसे लोकप्रिय खेल में सांप्रदायिकता के वायरस का जिस तरह प्रवेश कराया जा रहा है वह भी उक्त ख़्वाहिश को उजागर करता है. यह किसी स्टेडियम का नाम बदलने से ज्यादा गंभीर नतीजे दे सकता है. इस बीच, हिंदी फिल्मों की व्यक्ति-केन्द्रित दुनिया में भी राजनीतिक आधार पर विभाजन पैदा किए जा रहे हैं, क्षेत्रीय भाषाओं की फिल्मी दुनिया में तो यह दशकों से चल रहा है.

पंजा बड़ा होता जा रहा है. गुप्त दान के जरिए कॉर्पोरेट फंडिंग को आसान बनाकर राजनीतिक चंदे में बड़ी हिस्सेदारी हासिल कर ली गई है. इसके बरअक्स सिविल सोसाइटी के संगठनों के लिए चंदे के स्रोत सूख गए हैं. और जिमख़ाना क्लब के मैनेजमेंट पर कब्जा करके मयखाने के दरवाजे लुटिएन्स की जमात के लिए खोलने की पहल कर दी गई है.

इस तरह के कदम आसान भी हैं क्योंकि ऐसे अधिकतर संगठनों में प्रबंधन ढील-ढाला ही होता है. और पाया गया है कि सत्ता तंत्र की आलोचना करने वाले कई व्यक्तियों के लिए टैक्स चोरी दुखती रग होती है. उदाहरण के लिए, जिमख़ाना क्लब नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल के चंगुल में फंस गया. अब लुटिएन्स की और एक-दो संस्थाओं तथा ‘थिंक टैंकों’ पर कब्जा करने या उन्हें रास्ते पर लाने के लिए दबाव बढ़ रहा है.

उनकी कमजोरियां इन आलोचनाओं को भोथरा कर देती हैं कि ‘एजेंसियां’ केवल सरकार की आलोचना करने वालों के यहां टैक्स संबंधी छापे मार रही हैं और अन्य कार्रवाइयां कर रही हैं. लेकिन जिन्हें निशाना बनाया जा रहा है उनको देखकर साफ हो जाता है कि क्या संदेश देने की कोशिश की जा रही है. एक और संभावित रण क्षेत्र है उच्च शिक्षा का क्षेत्र.

ऊंचे दर्जे के दो शिक्षण संस्थान जेएनयू और जामिया मिल्लिया इसलामिया अलग-अलग रूपों में घेराबंदी महसूस कर रहे हैं. लेकिन केवल वे ही नहीं हैं. नियंत्रण का पसंदीदा तरीका सावधानी से चुन कर ऐसा कुलपति नियुक्त करना है जो बदलाव की शुरुआत ऊपर से करे. लेकिन पुलिसिया कार्रवाई का भी प्रभावी इस्तेमाल किया गया है. इस बीच, स्कूली पाठ्यपुस्तकों का संशोधन जारी है, इस तरह कि भारतीय इतिहास से नेहरू का नाम ही मिटा दिया गया है.

कभी-कभी सरकार अति भी कर देती है. जैसे कि यह आदेश जारी कर दिया गया कि जो लोग ऑनलाइन विज्ञान सेमीनारों में भाग लेना चाहते हैं वे पहले मंजूरी लें. वैसे, यह आदेश वापस ले लिया गया. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार की संवैधानिक गारंटी के मद्देनजर— हालांकि निजी स्वाधीनताओं को लेकर अदालतों से सुरक्षा की गारंटी संदिग्ध हो गई है- डिजिटल समाचार मीडिया के मामले में बनाए गए नये नियमों को भी वापस लेना पड़ सकता है. यह सरकार अपनी दिशा में कितनी दूर तक आगे जाएगी यह इस पर निर्भर होगा कि घरेलू संस्थाओं से कितना मजबूत प्रतिकार होता है, और सरकार अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं का कितना जोखिम उठाना चाहती है.

(यह लेख दिप्रिंट से लिया गया है)

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