ममता बनर्जी और तृणमूल भाग नहीं सकती

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पहले यह क़बूल करना होगा कि बंगाल में हिंसा हो रही है, कि हिंसा करनेवालों में बंगाल के सत्ताधारी और विधान सभा चुनाव में विजयी दल तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता आगे-आगे हैं. इस हिंसा के निशाने पर भारतीय जनता पार्टी के साथ वाम दलों, कांग्रेस और दूसरे राजनीतिक दलों के सदस्य और समर्थक हैं.

बारह से अधिक लोग मारे गए हैं, सैंकड़ों घर, गाँव छोड़कर भागने को मजबूर हुए हैं. इस हिंसा की ज़िम्मेदारी से तृणमूल के नेता भाग नहीं सकते. यह इससे स्पष्ट हो जाता है कि दल की नेता ममता बनर्जी ने अपने नव- निर्वाचित विधायकों से अपने समर्थकों को नियंत्रित करने का निर्देश दिया है. उन्होंने अपने समर्थकों से सीधे अपील की है कि वे हिंसा से बाज आएँ.

तो हिंसा है, हो रही है और सत्ताधारी दल की उसमें प्रमुख भूमिका है. इस हिंसा को पहले रोकना होगा, एक-एक हत्या और आगज़नी और तोड़फोड़ की वारदात की जाँच कर अपराधी की पहचान करनी होगी और राज्य द्वारा इंसाफ़ की प्रक्रिया को निष्पक्ष तरीक़े से सुनिश्चित करना होगा. यह कहने से काम नहीं चलेगा कि मुख्यमंत्री ने अपील की और हिंसा रुक गई.

क्या यह कम संतोष की बात नहीं है? हिंसा की हरेक घटना का हिसाब ज़रूरी है. मारा गया हर व्यक्ति अपने आप में विलक्षण है, हरेक के जीवन के अधिकार का हनन किया गया है और अगर हम एक सभ्य, संविधानसम्मत सामाजिक व्यवस्था में विश्वास करते हैं तो इस सवाल से मुँह नहीं चुरा सकते. हिंसा जिसने भी की उसे पहचान कर सज़ा तय करना ज़रूरी है. यह मानकर संतोष नहीं किया जा सकता कि चुनाव के दौरान और उसके बाद बंगाल की राजनीतिक संस्कृति में हिंसा होती रही है इसलिए इस बार की हिंसा भी कोई असाधारण बात नहीं है.

यह तो होना ही था, यह मानकर बैठ जाने का मतलब है हिंसा को परोक्ष रूप से स्वीकृति देना. चुनाव परिणाम घोषित होने के समय से ही आशंका व्यक्त की जा रही थी कि बंगाल की परिपाटी के अनुसार जीत या हार की हालत में भी हिंसा होगी. परिणाम घोषित होते वक्त ही इसे लेकर चेतावनी दी जा रही थी. फिर ममता बनर्जी या उनके सहयोगी नेता यह कहकर बच नहीं सकते कि उन्होंने हिंसा नहीं करवाई, हिंसा स्थानीय तनाव के कारण हुई और बहुत कुछ स्वतःस्फूर्त है.

वह खुद सावधानी बरत सकते थे, हर क्षेत्र में सख्त निगरानी रख सकती थी और कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेताओं को नियंत्रित भी कर सकती थीं. वह उन्होंने नहीं किया यह साफ़ है. अगर वे यह कहना चाहते हैं कि वे इस हिंसा को रोक नहीं पाए तो इसका अर्थ यह है कि वे जब अपने कार्यकर्ताओं को ही नेतृत्व नहीं दे सकते तो पूरे राज्य को कैसे चलाएँगे.

तृणमूल के लोग भी मरे

हिंसा में हर दल के लोग मारे गए हैं. तृणमूल के भी. इसका मतलब कि यह एकतरफा नहीं है. क्या यह कोई संतोष की बात है? अगर ममता बनर्जी यह कहती हैं कि इसमें हमारे लोग भी मारे गए हैं तो क्या बीजेपी या वाम दलों के जो लोग मारे गए, वे उनके लोग नहीं हैं? क्या उनकी सुरक्षा सिर्फ उनके अपने दल के लोगों के लिए होगी? क्या यह सिद्ध होकर ही रहेगा कि बंगाल में लोग नहीं रहते हैं, पार्टी सदस्य या समर्थक ही बसते हैं?

फिर कहना होगा कि बीजेपी के व्यक्ति को भी सम्मान से जीने का अधिकार है, भले ही उसकी पार्टी पराजित हो गई हो और वाम दलों और कांग्रेस और दूसरे दलों से सम्बद्ध लोगों को भी. वे अब तृणमूल के प्रसाद पर ही जीवित रहेंगे, यह भारत के संविधान का अपमान है. हिंसा साम्प्रदायिक नहीं थी, दलगत थी. हिंसा के शिकार लोगों में हर धर्म के लोग हैं और हिंसा करनेवालों में भी. यानी हिंसा राजनीतिक है, साम्प्रदायिक नहीं. यह तथ्य भी हिंसा की गंभीरता को कम नहीं कर सकता.

हिंसा का ‘धर्मनिरपेक्ष’ चरित्र उसके असर में कोई तब्दीली नहीं लाता. हत्याएँ होती ही हैं. लूटपाट, आगजनी, हिंसा के शिकार लोगों का अपमान होता ही है. यह हिंसा एक चक्रीय हिंसा को जन्म देती है. मौक़ा पड़ने पर हिंसा का जवाब भी दिया जा सकता है. यह चक्र किसके रोके रुकेगा अगर एक हिंसा को किसी भी कारण से बेहतर और वैध ठहराया जाता रहेगा?

मुख्यमंत्री का उत्तरदायित्व

इस समय सबसे अधिक उत्तरदायित्व बंगाल के शासक दल और उसकी सर्वमान्य नेता का है. उनके अलावा अन्य राजनीतिक दलों का और सामजिक संगठनों का भी. सीपीआई (एमएल) के नेता और कार्यकर्ता इस समय जिस प्रकार की भूमिका निभा रहे हैं, उसी तरह शेष दलों को भी हिंसा के खिलाफ सक्रिय रहना होगा. उन्हें चौकन्ना रहना होगा, सड़क पर रहना होगा, हिंसा की हर खबर की जाँच करनी पड़ेगी और बंगाल के अलावा दुनिया को भी तथ्य और सच बताते रहना होगा.

मुसलमानों के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार

यह इस समय ज़रूरी है क्योंकि अपने चरित्र के अनुसार इस हिंसा को हिंदू विरोधी हिंसा के रूप में प्रचारित करने के अभियान में कुछ लोग जुट गए हैं. ओडिशा, उत्तर प्रदेश, दिल्ली की हिंसा की पुरानी घटनाओं के वीडियो प्रसारित किये जाने लगे हैं और उन्हें बंगाल की अभी की हिंसा की तसवीरें बताया जा रहा है. ये लोग आरोप लगा रहे हैं कि तृणमूल के विजयी होते ही ‘जिहादी’ लोग हिंसा पर उतारू हो गए हैं.

हिंदुओं में उत्तेजना भरने के लिए आजमाई तरकीब दुहराई जा रही है. झूठा प्रचार किया जा रहा है कि हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया. पुलिस ने इस दावे को झूठ बताया है और एक महिला ने सामने आकर इस प्रचार को झूठा बतलाया है. ‘द टेलीग्राफ’ अखबार ने बीजेपी को सावधान किया है कि वह इस हिंसा को साम्प्रदायिक रंग देकर झूठा और हिंसक प्रचार न करे. आग से न खेलो, अख़बार ने चेतावनी दी है.

बंगाल में जनता ने बीजेपी को पूरी तरह ठुकरा दिया है और उसकी अब तक उसकी बोलती बंद थी. आज अगर वह फिर से सक्रिय हो गई है तो इसके लिए आज की हिंसा ने उसे मौक़ा दिया है. हिंसा है इसलिए हिंसा को लेकर दुष्प्रचार का अवसर भी है. बीजेपी यह जो प्रचार कर रही है, और आज पूरे भारत में विरोध प्रदर्शन कर रही है, वह इसलिए कि महामारी में उसकी सरकार के निकम्मेपन और जनता की जान के प्रति बेपरवाही की चतुर्दिक भर्त्सना से वह अपने समर्थकों और हिंदू मतदाता का ध्यान हटा कर उनमें भय पैदा कर सके कि अगर वह सत्ता में न रही तो हिंदू खतरे में रहेंगे. इस वक्त एक झूठ बोला जा रहा हैं.

सब जानते हैं ये झूठ कौन बोल रहा है और किस मक़सद से बोला जा रहा है. लेकिन ममता बनर्जी से यह ज़रूर कहा जा सकता है कि उन्होंने जीतने के बाद कहा था कि बंगाल ने भारत को बचा लिया. बचना किससे? हिंसा से. अगर वे अपने यहाँ प्रतिशोध, सबक सिखाने की राजनीति को खत्म नहीं कर सकीं तो उनकी विजय निरर्थक हो जाएगी.

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