ममता ने घायल कर दी बीजेपी की रणनीति!

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ममता बनर्जी जब व्हील चेयर पर चुनाव प्रचार करने उतरेंगी तब तक पहले और दूसरे चरण के नामांकन की प्रक्रिया ख़त्म हो चुकी होगी और तीसरे चरण की चल रही होगी. 27 मार्च, 1 अप्रैल और 6 अप्रैल को इन तीनों चरणों के लिए मतदान होना है.

निस्संदेह इन तीनों चरणों में व्हील चेयर पर चुनाव प्रचार करतीं ममता बनर्जी सबसे बड़ा मुद्दा रहेंगी. ममता बनर्जी के साथ घटी घटना इसी मायने में महत्वपूर्ण है जिसे हादसा और नौटंकी बताया जा रहा है. इस वाकये ने टीएमसी विरोधी दलों, ख़ासकर बीजेपी की नींद उड़ा दी है. पश्चिम बंगाल में 8 चरणों में हो रहे मतदान के पहले तीन चरणों में जिन सीटों पर मतदान होना है वहाँ बीजेपी का प्रभाव बाक़ी चरणों में होने वाली सीटों के मुक़ाबले ज़्यादा है.

चुनाव की तारीखों को पक्षपातपूर्ण बताए जाने के पीछे यह सबसे बड़ा तर्क रहा था कि पश्चिम बंगाल में तीसरा चरण आते-आते बाक़ी चार राज्यों में मतदान हो चुके होंगे. फिर नयी रणनीति और नयी ऊर्जा के साथ बीजेपी चुनाव मैदान में उतरेगी. घायल ममता बनर्जी ने बीजेपी की इस रणनीति को ही घायल कर डाला है.

जब से ममता बनर्जी घायल हुई हैं तब से टीवी चैनल पर वह मुद्दा बनी हुई हैं. बाक़ी मुद्दे गौण हो गये हैं. इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि ममता बनर्जी के पैर में मल्टीपल फ्रैक्चर हैं, उन्हें चोट लगी है और उनका इलाज चल रहा है. बीजेपी का पूरा दम यही साबित करने में लगा हुआ है कि ममता पर हमला नहीं हुआ है और यह हादसा था.

पूरी गोदी मीडिया बीजेपी की ओर से यही काम करने में जुटी है. मगर, अब तक उनकी बातें साबित नहीं हो पा रही हैं कि वाक़ई यह हमला न होकर हादसा या ‘नौटंकी’ थी. ममता के साथ घटी घटना में दो बातें ग़ौर करने लायक हैं- अब तक घटना का कोई ऐसा वीडियो सामने नहीं आया है जिसमें साफ़ तौर पर देखा जा सके कि ममता बनर्जी को चोट लगी कैसे.

(यह आश्चर्यजनक है क्योंकि पूरा मीडिया नामांकन से पहले और बाद की तसवीरें कवर करने में जुटा हुआ था!) सामने आया वीडियो यह बताता है कि ममता बनर्जी अपनी कार के पायदान पर खड़ी थीं, दोनों हाथ जोड़ रही थीं. वीडियो में स्पष्ट रूप से यह दिखता है कि एक समय वह भीड़ से घिर गयीं.

पहले से ज़्यादा आक्रामक हैं जख्मी ममता

ममता बनर्जी का रणनीतिक ‘खेला’ बीजेपी से कहीं अधिक आक्रामक है. शुभेंदु अधिकारी के चुनाव क्षेत्र नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का फ़ैसला इसी आक्रामकता को बयाँ करता है. नंदीग्राम में ‘हिंदू की बेटी’ होकर नामांकन करने के बाद ममता बनर्जी व्यक्तिगत रूप से चोटिल होकर अस्पताल में हैं लेकिन राजनीतिक रूप घायल होकर बीजेपी के नेता अनाप-शनाप बोल रहे हैं. ‘आह’ दोनों ओर से निकली है.

एक की आह में व्यक्तिगत रूप से चोटिल होने का दर्द है तो दूसरे की ‘आह’ में राजनीतिक नुक़सान की पीड़ा. ममता बनर्जी के बयान के मुताबिक़ चार-पाँच लोगों के हमले के कारण यह घटना घटी. भीड़ से घिरे रहने की स्थिति में ऐसा संभव है. मगर, इसकी पुष्टि के लिए विजुअल्स और चश्मदीद दोनों ज़रूरी हैं. जाँच के बाद ही ममता के दावे की भी पुष्टि हो पाएगी. मगर, जब तक पुष्टि नहीं होती है तब तक ममता को ग़लत ठहराने की पुरजोर कोशिशें जारी हैं. ऐसा करके ही बीजेपी शुरुआती तीन चरणों में अपने प्रभाव के अनुरूप प्रदर्शन कर पाएगी.

ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के उस फ़ैसले पर भी उँगली उठाई है जिसमें डीजीपी को हटाए जाने का फ़ैसला हुआ. ऐसा करते हुए ममता चुनाव आयोग को बीजेपी का सहयोग करते हुए दिखाने की रणनीति को ही आगे बढ़ा रही हैं. वह जता रही हैं कि पुलिस प्रशासन पर टीएमसी सरकार की पकड़ नहीं रह गयी है. चुनाव आयोग के सहयोग से प्रशासन का नियंत्रण केंद्र के पास आ गया है और इसी कारण एक मुख्यमंत्री पर यह ‘हमला’ हुआ है. मोदी सरकार पर संघीय व्यवस्था को कमजोर करने के लगते रहे आरोपों की भी इससे पुष्टि होती है.

सीएए-एनआरसी का मुद्दा चलेगा?

6 अप्रैल तक शुरुआती तीन चरणों के मतदान के लिए बीजेपी की रणनीति में सीएए-एनआरसी का मुद्दा नहीं है. ऐसा इसलिए कि इससे असम समेत बाक़ी राज्यों में बीजेपी को राजनीतिक नुक़सान हो सकता था. यहाँ तक कि 10 अप्रैल को चौथे चरण का चुनाव भी केवल हिन्दुत्व के नारे के साथ बीजेपी लड़ सकती है. मगर, अंतिम चार चरणों की 160 सीटों या फिर इसे थोड़ा और स्पष्ट करें तो अंतिम तीन चरणों की 115 सीटों के लिए बीजेपी की रणनीति बिल्कुल अलग है.

मुसलिम वोटरों के प्रभाव वाली सीटें यही हैं. ये चुनावी चरण ही पूरे चुनाव अभियान के स्लॉग ओवर्स हैं और आक्रमण के लिए सारे अमोघ अस्त्र भी बीजेपी ने इसी दौर के लिए बचा रखे हैं. 12 अप्रैल से रमजान शुरू होने के बाद इन इलाक़ों में मतदान रखना भी रणनीतिक है ताकि मतदान प्रतिशत नियंत्रित रह सके.

ममता-शुभेंदु के नंदीग्राम में दूसरे चरण में वोट डाले जाने हैं. ऐसा लगता है कि ममता ने नंदीग्राम से पहले और तीसरे चरण के चुनाव प्रचार अभियान को भी लगाम देने की ठान ली है. व्हील चेयर से वह इस काम को कर दिखाएंगी. ममता के लिए इन तीन चरणों में अच्छे प्रदर्शन का मतलब होगा तीसरी बार सत्ता की कुर्सी तक आसान पहुँच. वहीं, अगर इन तीन चरणों में बीजेपी पिछड़ जाती है या उम्मीद के अनुरूप बढ़त नहीं ले पाती है तो बाक़ी चरणों में उसके लिये बढ़त बना पाना टेढ़ी खीर हो जाएगी. ख़ुद शुभेंदु अधिकारी के लिए यह राजनीतिक रूप से जीवन-मरण का सवाल है.

कांग्रेस-लेफ्ट के लिए ममता बनर्जी के साथ घटी घटना को पचा पाना मुश्किल हो रहा है. लेफ्ट की प्रतिक्रिया तो फिर भी सधी हुई दिख रही है लेकिन कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी की प्रतिक्रिया बिल्कुल अप्रत्याशित है. बीजेपी से भी सख्त भाषा में अधीर रंजन चौधरी ममता बनर्जी पर हमला कर रहे हैं.

यह समय कांग्रेस और लेफ्ट के लिए अपने वोट बैंक को बचाए रखने के लिए कोशिश करने का है. चोटिल ममता के साथ अगर लेफ्ट-कांग्रेस संवेदना न भी दिखाए तो वे चुप रहकर वक़्त जाया कर सकते हैं. लेकिन, ममता के साथ घटी घटना को नौटंकी बताने का फ़ायदा कांग्रेस या लेफ्ट को क़तई नहीं होगा. अगर इनकी बातों पर वोटरों ने विश्वास भी किया, तो इसका फायदा बीजेपी को ही होगा.

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