मुसलमानों को लेकर RSS में कई दौर का मंथन जारी

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अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से लेकर पश्चिम की प्रभावशाली मीडिया तक जिस तरह आज बीजेपी और आरएसएस (RSS) की नीतियों को देख समझ रही है उसे लेकर अब संघ में भी मंथन है. इस मंथन का एक हालिया परिणाम ये है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत देश के मुसलमानो के बारे में आजकल उदार विचार व्यक्त कर रहे हैं.

दो महीने पहले मोहन भागवत ने गाज़ियाबाद में मुस्लिम राष्ट्रीय मंच में शिरकत की और अब सितम्बर में संघ (RSS) प्रमुख ने मुंबई के एक पांच सितारा होटल में मुस्लिम विद्वानों के साथ लम्बी बातचीत की है. चाहे डेमोक्रैट बाइडन सरकार हो या अमेरिका, ब्रिटैन और यूरोप की सशक्त मीडिया, दुनिया का परसेप्शन बदलने वाली ये ‘लिबरल सोसाइटी’ बीजेपी-आरएसएस की मुसलमानो के प्रति राय को संशय से देखती हैं.

हद तो ये है कि चीन की तानाशाह सरकार भी अब मोदी-शाह की ऐसी नीतियों पर सार्वजनिक मंच पर तंज़ करने लगी है. चीन के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने बीजेपी-आरएसएस (RSS) के विरोध में तो मोर्चा ही खोल रखा है. वाशिंगटन पोस्ट, न्यू यॉर्क टाइम्स, गॉर्डियन और गल्फ न्यूज़ जैसे अख़बार पहले से ही संघ विचारधारा पर प्रहार कर रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी के लिए मुश्किलें इसलिए भी खड़ी हो रहीं हैं कि उन्होंने चीन-रूस एक्सिस को दर किनार कर विदेश नीति के सारे अंडे राष्ट्रपति ट्रम्प की टोकरी में रख दिए थे.

पीएम मोदी ने ट्रम्प के साथ जो नज़दीकियां प्रोजेक्ट की उसका नुक्सान ट्रम्प के हारने से कहीं ज्यादा हो गया. अमेरिका में ‘इस बार ट्रम्प सरकार’ का नारा लगाने वाले मोदी से बाइडन और उनकी सहयोगी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस इस कदर नाराज़ थे कि सत्ता में आते ही डेमोक्रैट सोनल शाह और अमित जैन को सरकार में जगह नहीं दी गयी. सोनल शाह का वाइट हाउस में जाना तय था पर उनके पिता रमेश शाह आरएसएस के एकल विद्यालय के संस्थापक रहे और इसलिए सोनल का पत्ता काटा गया.

बाइडन ने बीजेपी-आरएसएस से जुड़े कई और मेधावी भारतीय डेमोक्रैट नेताओं को भी सत्ता से दूर कर दिया. जानकारों के मुताबिक मोदी सरकार ने औद्योगिक विकास के बजाय जिस तरह ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ को तरजीह दी उससे पश्चिम को लगा कि ये सरकार देश में आर्थिक सुधारों की जगह सिर्फ आरएसएस के अजेंडे को बढ़ाकर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के सहारे चुनाव जीतना चाहती है.

नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए), नेशनल रजिस्टर आफ सिटीजन (एनआरसी) और तीन तलाक जैसे कई फैसलों को भी मुस्लिम विरोधी करार देने की कोशिश की गयी. उधर आर्थिक मंदी, कोरोना के लॉक डाउन और चीन के साथ शीतयुद्ध जैसी स्थिति से चरमराई अर्थव्यवस्था ने भाजपा सरकार की दुश्वारियों को और भी बढ़ा दिया. मुश्किल दौर से गुजर रहे देश का दुनिया में ये परसेप्शन न बने कि मोदी सरकार अल्पसंख्यक विरोधी है, इसे लेकर अब संघ के वरिष्ठ पदाधिकारियों में मंथन के कई दौर चल रहे हैं.

सूत्रों का कहना है कि मुस्लिम राष्ट्रीय मंच से मोहन भागवत का ये कहना कि हिन्दू-मुस्लिम एकता की अवधारणा को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है और दोनों समुदाय भाइयों की तरह एक परिवार के समान हैं, संघ की इस दिशा में नए प्रयास हैं. मुस्लिम कट्टरपंथियों और जेहादी मनोवृति की हमने आलोचना की है लेकिन हम कभी भी देश के मुस्लिम समाज के विरोध में खड़े नहीं हुए. हम चाहते है कि पूरा राष्ट्र एक होकर भारत को सर्वशक्तिमान बनाये. किसी को भी पीछे छोड़ना हमारा कभी भी उदेश्य नहीं रहा.

संघ से जुड़े एक प्रचारक ने कहा, बहरहाल मुंबई में मुस्लिम विद्वानों से भागवत की बहुप्रतीक्षित बातचीत भी इसी कड़ी का एक हिस्सा है. भागवत चाहते हैं कि मुस्लिम समाज की शिक्षा कैसे बेहतर की जाये और उनकी युवा प्रतिभा को आगे कैसे लाया जा सके. संघ उन मुस्लिम विद्वानों को भी महत्व देना चाहता है जो देश की मुख्यधारा की सोच से जुड़े दीखते हैं.

ज़ाहिर है इस दिशा में ज़ाकिर नायक जैसे कट्टरपंथियों को आरएसएस के विचारक, देश के अल्पसंख्यक समाज से दूर रखना चाहते है. लेकिन ऐसी सकारात्मक सोच के साथ, संघ और भाजपा को अपने उन समर्थकों की ज़ुबान पर भी लगाम कसनी होगी जो साम्प्रदयिक माहौल बिगाड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते हैं.

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