किसान आंदोलन में सियासी तड़का…पढ़िए जाटलैंड से ग्राउंड रिपोर्ट

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2022 के विधानसभा चुनाव से पहले किसान आंदोलन के बहाने जाटलैंड में सियासी महासमर शुरू हो गया है. अपनी खोई जमीन जुटाने में लगे राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के हाथ यह अच्छा मौका लगा है. तमाम पंचायतों के जरिए बीजेपी को घेरने में जुटी आरएलडी को भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) का साथ मिला है.

बीकेयू ने बीजेपी नेताओं का बहिष्कार करने का आरएलडी को अस्त्र थमाया है. हालांकि इसके बहाने इलाके में जो सियासी रंजिशों का दौर शुरू हो चुका है, उससे काफी खतरनाक स्थितियां सामने आ सकती हैं. पहले शामली में नारेबाजी और अब सौरम गांव में आरएलडी और बीजेपी समर्थकों के बीच मारपीट की घटना हुई.

आरएलडी जिस तरह सक्रिय है, उससे लग रहा है कि अब इस राजनीतिक युद्ध में बीकेयू भी उसकी बगलगीर बन चुकी है. कृषि कानूनों की वापस की मांग के बीच गन्ने के दाम ना बढाए जाने को लेकर बीजेपी के खिलाफ आरएलडी समेत दूसरे दलों को सियासी हथियार मिल गया है. बीकेयू राष्ट्रीय राजधानी की सीमा पर स्थित गाजीपुर आंदोलन स्थल पर प्रदर्शन की कमान संभाले हुए है तो सिसौली में चौधरी नरेश टिकैत इस जंग में सेनापति की भूमिका निभा रहे हैं.

गणतंत्र दिवस पर हिंसा के बाद प्रदर्शन स्थल पर पुलिसिया कार्रवाई के बाद वह जाट बहुल क्षेत्र में किसानों की लामबंदी में जुटे हैं. इसे लेकर पिछले दिनों यहां हुई पंचायत में बीकेयू नेताओं के साथ समाजवादी पार्टी, आरएलडी और कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी बताती है कि यह सभी दल किसानों के गुस्से को अपनी राजनीतिक हैसियत पाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

आरएलडी-बीकेयू की जुगलबंदी से बदल रहे समीकरण

पिछले चुनावों में इस इलाके में आरएलडी का सूपड़ा साफ हो गया था. कांग्रेस और एसपी की हालत खस्ता कर बीजेपी महाशक्ति के रूप में उभरी थी. वेस्ट यूपी के कई जिलों में आरएलडी और बीकेयू ने किसान पंचायतों से कृषि कानूनों का विरोध को लेकर ताल ठोकी. वहीं गैर राजनीतिक कही जाने वाली बीकेयू भी उसके साथ खडी नजर आई. अजित सिंह की अगुआई वाला आरएलडी किसानों की पंचायतें बुलाने का नेतृत्व कर रहा है. इसमें बीकेयू के नेता भी हिस्सा ले रहे हैं.

सोमवार को हुई घटना को लेकर शाहपुर थाने पर आरएलडी और बीकेयू समर्थकों के प्रदर्शन के बाद केंद्रीय राज्यमंत्री डाॅ संजीव बालियान के खिलाफ तहरीर दी गई. 26 फरवरी को महापंचायत का ऐलान कर आरएलडी नेताओं ने अपने इरादे जाहिर कर दिए थे. भारतीय किसान यूनियन के प्रमुख चौधरी नरेश टिकैत ने सौरम पहुंचने के बाद किसानों से मुलाकात की. मुजफ्फरनगर से लेकर मथुरा तक आरएलडी ऐसी पंचायतों में खासी भीड़ जुटा रही है.

शामली और बिजनौर में हुई पंचायतों में समाजवादी पार्टी और बीकेयू नेताओं की उपस्थिति नजर आई, जो बीजेपी के लिए परेशानी का सबब बन रहा है. 2013 में मुजफ्फरनगर दंगों के बाद वोटों के ध्रुवीकरण से बीजेपी ने खासा चुनावी लाभ हासिल किया है. हालांकि उस समय चौधरी अजित सिंह और आरएलडी चुप्पी साधे रहे थे. अब उनकी अचानक सक्रियता से सियासी मोर्चाबंदी में जाट समाज में टूट के आसार बन रहे हैं.

इससे पहले अपने पुराने जाट-मुस्लिम समीकरण को पुनर्जीवित करने के लिए जयंत चौधरी जाट मुस्लिम बहुल क्षेत्र शामली में पंचायत कर चुके हैं. इससे पहले आरएलडी का 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में पश्चिमी यूपी से सफाया हो गया था.

मुसलमान आ रहे जाटों के साथ! बदलेगा समीकरण

किसानों से अगले विधानसभा चुनाव में योगी और मोदी सरकारों को सबक सिखाने को कहा गया है. दंगों में हुई तकरार को पाटते हुए मुजफ्फरनगर में भी बड़ी संख्या में मुसलमान जाटों के साथ आ गए हैं. यहां तक कि बीकेयू का मुस्लिम चेहरे माने जाने वाले गुलाम मोहम्मद जोला भी इसमें शामिल हुए. 2013 के दंगों के बाद वह यूनियन से दूर हो गए थे.

लगभग आठ साल पहले मुजफ्फरनगर दंगों में 63 लोगों की मौत (आधिकारिक आंकड़ा) के बाद टूटे रिश्तों को जोड़ने में जुटे आरएलडी को इसमें सियासी फायदा नजर आ रहा है, लेकिन लग रहा है कि इससे जाटों के बीच बड़ी खाई खोदने का काम भी शुरू हो गया है. यही जाट पिछले चुनावों में बीजेपी के साथ एकजुट रहा है। अब बीजेपी के लिए नई चुनौती खड़ी हो सकती है.

पंचायत चुनाव में बीजेपी को कमजोर करने का ख्वाब संजोया

किसान आंदोलन के सहारे मंत्री संजीव बालियान के विरोध के भी कई मायने हैं. आरएलडी समर्थकों में छोटे चौधरी की हार का दर्द अब भी साल रहा है. आरएलडी विधानसभा चुनाव से पहले होने वाले त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में बीजेपी को कमजोर करने का ख्वाब देख रही है. कांग्रेस और समाजवादी पार्टी भी इस मामले में पीछे नहीं है. कांग्रेस बघरा में हाल में प्रियंका गांधी की बड़ी सभा कर चुकी है. दूसरी और मुजफ्फरनगर में एसपी के जिला अध्यक्ष प्रमोद त्यागी भी अखिलेश यादव का संदेश लेकर चौधरी नरेश टिकैत से मिल चुके हैं. उनका कहना है कि हरियाणा में जाटों ने बीजेपी को सबक सिखाया है और अब यूपी की बारी है.

याद रहे कि 2019 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी के सत्यपाल सिंह ने बागपत में जयंत चौधरी को केवल 25,000 वोटों से हराया था, जबकि चौधरी को 5 लाख वोट मिले थे. वह मुस्लिम और जाट वोटों के बंटने के कारण हार गए थे. मुजफ्फरनगर में डाॅक्टर संजीव बालियान के हाथों खुद अजित सिंह मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण के बावजूद करारी हार देख चुके हैं. 2012 के विधानसभा चुनावों में यहां की 11 जाट बहुल सीटों में से आरएलडी ने पांच और एसपी-बीएसपी ने तीन-तीन सीटें जीती थीं. बीजेपी खाली हाथ रही थी. 2013 के बाद बीजेपी को लगातार दो आम चुनावों में 50-75 प्रतिशत से ज्यादा जाट वोट मिले.

गैर जाट बिरादरियां हो सकती हैं एकजुट

पिछले चुनावों में तो आरएलडी, कांग्रेस और एसपी का सूपड़ा साफ हो गया था. हालांकि इस उठापटक में गैर जाट बिरादरियां एकजुट हो सकती हैं. यह जातियां कृषि कानूनों को लेकर उत्तेजित नहीं हैं, क्योंकि वे छोटे किसान हैं. खतरा इस बात को लेकर है कि बीकेयू अध्यक्ष ने बीजेपी के जनप्रतिनिधियों को गांवों में ना घुसने देने का ऐलान कर संघर्ष की जो भूमिका तैयार की है, वह खतरनाक हो सकती है. गांव-गांव टकराव का मोर्चा खुला तो यह जाटलैंड के लिए बड़े दुर्भाग्य की बात होगी.

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