रविश कुमार ने खोली पोल

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ravish kumar

आपको याद होगा कि पिछले साल जुलाई में रफाल विमान आने वाला था. गोदी मीडिया के चैनलों ने उसके विजुअल से स्क्रीन को भर दिया. रफाल विमान की खूबियां ज़ोर ज़ोर से बताने लगा और उन लोगों को चिढ़ाने लगा जो रफाल के सौदे पर आरोप लगाया करते थे कि इस डील के ज़रिए अनिल अंबानी की कंपनी को फायदा पहुंचाने की कोशिश हुई है. चैनलों पर रफाल को लेकर चमकदार हेडिंग लगाई गई, ऐसे जैसे गुलाब जल लेकर बारात के स्वागत में एंकर दरवाज़े पर खड़े हों.

रफाल विमान के सौदे में दलाली और संदेह के बादल फिर से लौट आए हैं. फ्रांस की न्यूज़ वेबसाइट मीडिया पार्ट ने तीन कड़ियों में खोजी रिपोर्ट पेश करने का दावा किया है. इस रिपोर्ट में मीडियापार्ट ने दावा किया है विमान बनाने वाली कंपनी दसाल्ट कंपनी ने एक भारतीय बिचौलियों को कथित रूप से करीब आठ करोड़ की रिश्वत दी है. मीडिया पार्ट ने अपनी पहली रिपोर्ट में लिखा है कि इस डील में संदिग्ध बिचौलिए थे, दलाली दी गई और डील से उन शर्तों को हटाया गया जिनका पता चलने पर सज़ा का प्रावधान था.

यही नहीं गुप्त माने जाने वाले संवेदनशील दस्तावेज़ लीक किए गए. किसके फायदे के लिए? मीडिया पार्ट के यान फ़िलिपिन ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि फ्रांस के एंटी करप्शन अथॉरिटी ने रफाल बनाने वाली कंपनी की ऑडिट के दौरान कुछ गड़बड़ी पाई है. वेबसाइट इस जांच से संबंधित दस्तावेज़ प्रकाशित करने की बात कर रहा है जो अभी तक सामने नहीं आए हैं. फ्रेंच एंटी करप्शन ब्यूरो (AFA) ने रफाल बनाने वाली कंपनी दसौ की ऑडिट के दौरान पाया है कि इस सौदे के लिए एक मिलियन यूरो की पेमेंट उस व्यक्ति को दी गई जिसकी जांच भारत सरकार किसी दूसरे मामले में कर रही है.

इसी बिचौलिए को करीब साढ़े आठ करोड़ से अधिक के पेमेंट होने का दावा किया जा रहा है. मीडिया पार्ट का दावा है कि भले ही भारत और फ्रांस की सरकारों ने इन मामलों को दबा दिया लेकिन अनगिनत पन्नों की पड़ताल से पता चलता है कि करप्शन हुआ था. 23 सितम्बर 2016 को रफ़ाल डील पूरी हो जाने के बाद दसौ ने ये रक़म एक भारतीय सब-कॉंट्रैक्टर डेफ़सिस solutions को देने का वादा किया था.

दसौ ने कहा था कि ये रक़म रफ़ाल जेट के 50 बड़े डुप्लिकेट मॉडल बनाने के लिए दिए गए थे. दसौ इस बात का प्रमाण नहीं दे सका कि ये मॉडल बनाए भी गए या नहीं. यानी पैसा दे दिया और जहाज़ का पता नहीं. हवाई जहाज़ हवा हो गया. जिस रक़म को defsys solutions को दिया गया उसे दसौ ने “gifts to clients” की हेडिंग में लिखा हुआ है. दसौ ने जवाब में एक बिल पेश किया जिसके मुताबिक़ defsys को 50 डमी मॉडल बनाने के लिए 1 मिलियन यूरो का 50% दिया गया था. हर मॉडल की क़ीमत 20 हज़ार युरो से ज़्यादा थी. मगर इसे तोहफ़े के तौर पर एंट्री में क्यों डाला गया इसका कोई ब्यौरा नहीं दिया गया है.

भारत के जिस बिचौलियों को पेमेंट देने की बात हो रही है उसका नाम मीडिया पार्ट की रिपोर्ट में नहीं है. लेकिन कंपनी का नाम है तो इस सिलसिले में स्क्रोल की रिपोर्ट है कि defsys solutions के मालिक सुशेन गुप्ता को मार्च 2019 में ED ने मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ़्तार किया था. AgustaWestland के केस में. बाद में उन्हें बेल हो गई थी. इसे लेकर कांग्रेस फिर से हमलावकर हो गई है. 2019 के चुनाव में रफाल सौदे में दलाली का मुद्दा खूब उठा था. कांग्रेस के रणदीप सुरजेवाला ने कहा है कि साठ हज़ार करोड़ के रक्षा घोटाले की कलई फिर से खुल गई है. क्या प्रधानमंत्री अब जवाब देंगे? यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी और प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी कि कोर्ट अपनी निगरानी में जांच करे. कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी थी. यशवंत सिन्हा अब तृणमूल कांग्रेस में चले गए हैं.

यशवंत सिन्हा ने भी कहा है कि सच्चाई आखिर बाहर आ ही गई. हमारी जांच एजेंसियों ने पर्दा डालने का काम किया है. फ्रांस में सच्चाई सामने आई है. हमारी सरकार को शर्म आनी चाहिए. हमारी जांच एजेंसियों को भी शर्म आनी चाहिए. यशवंत सिन्हा का ये बयान है. सब इस मामले में मीडिया की चुप्पी का भी हवाला दे रहे हैं. भारत का मीडिया रफाल की खूबियां बताने लगता है जब भी दलाली की बात होती है. आपको याद होगा कि पिछले साल जब रफाल आने वाला था तब किस तरह से हंगामा मचा था कि रफाल आ गया रफाल आया.

उनकी हेडलाइन रफाल के गाने गा रही थी लेकिन दलाली के सवालों से बच रही थी. हमने प्राइम टाइम में रफाल आया रफाल आया के जुनून पर तंज किया था. जब भी सवाल उठता है आपको बताया जाता है कि रफाल की खूबी क्या है. जबकि मीडियापार्ट की रिपोर्ट में कहा गया है कि इस डील से एंटी करप्शन की शर्तें हटाई गईं और गुप्त जानकारियों को लीक किया गया. अक्तूबर 2018 में कोर्ट ने सरकार से कहा कि 36 रफाल फाइटर विमानों के कीमतों की जानकारी बंद लिफाफे में दे. कोर्ट ने कहा था कि गुप्त संवेदनशील जानकारियां गुप्त रखी जाएंगी. तब के चीफ जस्टिस और आज के राज्यसभा सदस्य रंजन गोगोई की बेंच इस मामले को सुन रही थी.

सरकार ने पहले कहा था कि वह कीमतों की जानकारी नहीं देगी लेकिन बाद में कोर्ट को बंद लिफाफे में ये जानकारी देने के लिए तैयार हो गई. कोर्ट ने इसके बाद याचिका खारिज कर दी. ज़ाहिर है अब सरकार को भी प्रतिक्रिया देनी थी. मीडिया पार्ट की रिपोर्ट के बाद कि रफाल सौदे में आठ करोड़ की दलाली दी गई है, केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने प्रेस कांफ्रेंस की. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया. सवाल है कि क्या सुप्रीम कोर्ट के सामने वे दस्तावेज़ थे जिसके बारे में मीडिया पार्ट की रिपोर्ट में दावा किया गया है? अगर नए साक्ष्य भी आएंगे तब भी क्या जांच नहीं होगी क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दे दिया है. छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा में सुरक्षा बलों के 22 जवानों की मौत हो गई है.

उनकी शहादत के बहाने टीवी स्टूडियो से आप के भीतर उबाल पैदा करने की कोशिश तो होगी ही ताकि आप इस दुखद हिंसा के बहाने सवाल न पूछें और आपका ध्यान भटक जाए. और इस हंगामे में उनसे सवाल नहीं पूछे जाएंगे जिन पर ऐसी हिंसा न होने देने की ज़िम्मेदारी है. जिनका नाम है गृहमंत्री अमित शाह. शिवराज पाटिल के बाद से अब किसी घटना के लिए गृहमंत्री ज़िम्मेदार नहीं होते हैं. ये किसी भी गृहमंत्री के लिए काफी अच्छी खबर है.

गोदी मीडिया ने सरकार से प्रश्न करने वालों लिए एक शब्द गढ़ा अर्बन नक्सल. गृह मंत्रालय इस शब्द का इस्तमाल नहीं करता है लेकिन गृह मंत्री से लेकर प्रधानमंत्री तक इसका इस्तमाल चुनावी रैलियों में करते हैं. तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सासंद शांता चेत्री के पूछे गए सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने कहा था कि गृहमंत्रालय अर्बन नक्सल शब्द का इस्तमाल नहीं करता है. यह बताना ज़रूरी है क्योंकि फिर से इन शब्दों की आड़ में लापरवाही और जवाबदेही छिपा ली जाएगी. do you get my point. सोचिए तीन तरफ से नक्सली सुरक्षा बलों को घेर लेते हैं.

यह किसका फैसला था और किस स्तर पर रणनीति बनी थी? क्या गृहमंत्री को जानकारी थी? द हिन्दू में विजयिता सिंह की रिपोर्ट में गृहमंत्रालय के वरिष्ठ सुरक्षा सलाहकार के विजय कुमार का बयान छपा है, इस बयान को आप ध्यान से पढ़ें. पता ही नहीं चलेगा कि हमारी कोई रणनीति है. ऐसा लगेगा कि ये पता था कि माओवादी घात लगा कर बैठे हैं और हमारे सुरक्षा बलों को उनके जाल में फंसने के लिए धकेल दिया गया. हिन्दू में के विजय कुमार ने कहा है कि ”दो हफ्ते से माओवादी घात लगा कर बैठे थे. उनके बीच चूहा-बिल्ली का खेल चल रहा था. माओवादी सिलेगर जागरगुंडा की सड़क के निर्माण को रोकना चाहते थे. एक रणनीति के तहत सुरक्षा बलों को हटा लिया गया था और नक्सलियों का इंतज़ार किया जा रहा था.” विजय कुमार कहते हैं कि चूहा बिल्ली का खेल चल रहा है.

दो हफ्ते से जब यह चूहा बिल्ली का खेल चल रहा था तो रणनीति बनाने वाले लोग इतने शानदार क्यों निकले कि हमारी ही जवान फंस गए? हिडमा के छिपे होने की सूचना का आधार क्या था, क्या वो इतनी सही थी कि हज़ारों जवानों को झोंक दिया गया? इसी इंटरव्यू में गृह मंत्रालय के सुरक्षा सलाहकार विजय कुमार हिन्दू अख़बार से कहते हैं कि हाल ही में दक्षिण बस्तर के लिए पांच हज़ार केंद्रीय बलों की मंज़ूरी दी गई है. दो साल से यह प्रस्ताव अटका पड़ा था. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बघेल और गृहमंत्री के हस्तक्षेप से मंज़ूरी मिली है. विजय कुमार ही बता रहे हैं कि दक्षिण बस्तर के लिए पांच हज़ार केंद्रीय बल चाहिए. दो साल से यह प्रस्ताव अटका हुआ था. क्या इन दो साल में गृहमंत्री को पता ही नहीं चला कि धीरे-धीरे काम हो रहा है? क्या यही हमारी तत्परता है?

पिछले साल फरवरी में लोकसभा में गृहराज्य मंत्री ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि 2017 में माओवादी हिंसा की 908 घटनाएं हुई. सुरक्षा बलों के 75 जवान मारे गए. 2018 में माओवादी हिंसा की 833 घटनाएं हुईं. सुरक्षा बलों के 67 जवान मारे गए. 2019 में माओवादी हिंसा की 677 घटनाएं हुईं. सुरक्षा बलों के 52 जवान मारे गए. कई बार केवल संख्या से साबित नहीं होता कि नक्सली हिंसा को काबू करने में कामयाबी मिल रही है. हिंसा की 900 घटनाएं भी कम नहीं हैं और 677 भी कम नहीं हैं. आप इस मंज़र को कैसे बयां करेंगे कि 700 सुरक्षा बलों को नक्सली तीन तरफ से घेर लेते हैं और गोली चलाते हैं. उनके हथियार लूट ले जाते हैं और मार देते हैं.

क्या कह सकेंगे कि नक्सली कहीं से भी कमज़ोर हुए हैं? 3 फरवरी 2020 की एक रिपोर्ट है जो इंडियन एक्सप्रेस में छपी है. श्रीनाथ राव ने लिखा है कि महाराष्ट्र में भले ही राज्य में नक्सली हमले में कमी आई है लेकिन निजी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाने के मामलों में तेज़ी आई है. गढ़चिरौली, गोंदिया और चंद्रपुर में पिछले तीन साल में नक्सलियों ने काफी नुकसान पहुंचाया है. 2017 में 20 लाख की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया था जो 2019 में 8.9 करोड़ हो गया. महाराष्ट्र पुलिस की यह जानकारी है. पूर्वोत्तर में मिलिटेंट, मध्य भारत में नक्सल या माओवादी और जम्मू कश्मीर में आतंकवादी का इस्तमाल होता है. कई बार तीनों के लिए एक ही शब्द का इस्तमाल होता है लेकिन हम आपको असम ले चलेंगे ताकि पता चलेगा कि कैसे चुनावी वोट के लिए एक शब्द का इस्तमाल करने से बचा जाता है.

जहां प्रधानमंत्री उन लोगों से मुख्यधारा में लौट आने की अपील कर रहे हैं जिन्होंने बंदूकें उठा लीं. असम के चुनावों से संबंधित ख़बरों में आपने देखा होगा कि प्रधानमंत्री मोदी वहां की सभाओं में हिंसा के रास्ते पर गए नौजवानों से मुख्यधारा में लौट आने की अपील करते हैं. प्रधानमंत्री उनके लिए न तो आतंकवादी शब्द का इस्तमाल करते हैं, न चरमपंथी और न ही उग्रवादी. क्या इस वजह से कि यह आरोप न लगने लगे कि वोट के लिए मिलिटेंट से मुख्यधारा में लौट आने की अपील कर रहे हैं. प्रधानमंत्री मोदी असम की सभाओं में जंगल में बंदूक लेकर गए नौजवान कहते हैं तो कभी वर्ग संघर्ष के रास्ते पर गए नौजवान कहते हैं. मीडिया ने जब खबर लगाई तो हेडलाइन में मिलिटेंट ही था. PTI, हिन्दुस्तान टाइम्स, ट्रिब्यून, द प्रिंट, बिजनेस स्टैंडर्ड, स्क्रोल ने मिलिटेंट शब्द लिखा है.

अच्छी बात है कि चुनावी सभा में प्रधानमंत्री मिलिटेंट से लौट आने की अपील कर रहे हैं. लेकिन इस मिलिटेंट शब्द की अनुपस्थिति अखरने लग जाती है. गृहमंत्री अमित शाह इंडिया टुडे चैनल से एक इंटरव्यू में कहते हैं कि बंगाल नार्थ ईस्ट का प्रवेश द्वार है. इससे देश की सीमाएं लगी हैं. अगर बीजेपी बंगाल में सरकार नहीं बनाएगी तो देश की सुरक्षा को खतरा होगा. इस बयान से ऐसे लगेगा कि उग्रवाद की समस्या हर जगह बंगाल के कारण है और उसे दूर करने के लिए बीजेपी का बंगाल में सरकार बनाना ज़रूरी है. क्या असम में मिलिटेंसी की समस्या बंगाल के कारण है? वैसे सीमा से घुसपैठ रोकने का काम तो गृहमंत्रालय का है. पूछा जाना चाहिए कि क्या केंद्रीय बलों की ये हालत हो गई है कि उनके रहते राज्य सरकार घुसपैठ करा रही है? मगर पूछा नहीं जाता है.

आखिर केंद्र सरकार के हस्तक्षेप से मिज़ोरम को म्यांमार से आ रहे शरणार्थियों को शरण देने में पीछे हटना पड़ा जबकि मिज़ोरम उन्हें शरण देना चाहता है. क्या आप समझ पा रहे हैं? वैसे तो यही तरीका सही है. लेकिन असम में आप यह नहीं कहते हैं कि हिंसा करने वालों को छोड़ा नहीं जाएगा. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी असम में पिछले साल नक्सलियों से भी मुख्यधारा में लौटने की अपील कर चुके हैं. यह बताने का मकसद यही है कि किस तरह नक्सली समस्या और आतंकवाद को लेकर हिन्दी प्रदेशों को भरमाया जाता है. जम्मू कश्मीर के आतंकवाद को आतंकवाद से ज्यादा अल्पसंख्य के खिलाफ बहुसंख्यक का ध्रुवीकरण करने के लिए किया जाता है.

नक्सल के नाम पर अर्बन नक्सल का इस्तमाल आपने दिल में बुद्धीजीवियों के प्रति नफरत भरने के लिए किया जाता है. और पूर्वोत्तर की हिंसा और मिलिटेंसी को इसलिए छोड़ दिया जाता है क्योंकि इसके ज़िक्र से हिन्दी प्रदेश के नेताओं और वोटर में जूनून पैदा नहीं होता है. लेकिन आपने देखा कि प्रधानमंत्री असम में उग्रवादी आतंकवादी और नक्सल तीनों से हथियार डाल कर जीवन में आने की अपील कर रहे हैं. कौन जवाब देगा कि पीएम की इस अपील के बाद क्या नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए किस तरह के प्रयास हुए? बातचीत की कोई नीति बनी है सरकार की? आज आप इतना भर कह दें कि नक्सली समस्या को दूर करने के लिए सरकार को बातचीत करनी चाहिए तो गोदी मिडिया हंगामा कर देगा. क्या बोडो मिलिटेंसी के कारण हमारे सुरक्षा बल और नौजवान नहीं मारे गए?

हज़ारों की संख्या है. मगर असम में वोट लेना है तो वापसी की अपील की जाती है. यह खबर 14 मार्च 2021 के इकोनमिक टाइम्स में और दूसरी जगहों पर भी छपी है. बोडोलैंड के पुलिस चीफ एल आर बिश्नोई कहते हैं कि आत्मसमर्पण करने वाला मिलिटेंट का एक दल वापस जंगल लौट गया है. नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट बोरोलैंड के एम बाथा और उसके तीस साथी जंगल में लौट गए हैं. इनमें से कुछ समर्पण करने वाले हैं तो कुछ नए नौजवान भी हैं. उनके पास अत्याधुनिक हथियार हैं.

बाथा का संगठन नेशनल लिबरेशन फ्रंट आफ बोरोलैड अलग बोरो राज्य की मांग करता है. इसी 30 मार्च का असम के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक और बोड़ोलैंड के पुलिस चीफ का एक और बयान है कि प्रधानमंत्री एक अप्रैल को कोकराझार का दौरा कर रहे हैं. इस कारण ज़िले में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है. मिलिटेंट का ग्रुप कुछ बड़ा करने की योजना पर काम कर सकता है. इस सिलसिले में पुलिस ने सर्च किया और तीन AK56 बरामद किए हैं. क्या इसे लेकर गोदी मीडिया का एंकर चीखेगा कि ऐसे लोगों को वापसी के लिए अपील हो रही है जो प्रधानमंत्री की सुरक्षा के लिए चुनौती हैं. बोडो लोगों की बात तो सुननी पड़ेगी, सरकार सुन भी रही है.

इस बयान में कोई बुराई नहीं है. हिंसा को दूर करने के तमाम रास्तों में बातचीत और समर्पण का रास्ता तो है ही. यही कारगर रास्ता है. नक्सली हिंसा हो या पूर्वोत्तर की उग्रवादी हिंसा या जम्मू कश्मीर का आतंकवाद, इनके नाम पर अलग अलग तरीके से चुनावी शोर पैदा किया जाता है. नोटबंदी जैसे बोगस फैसले से इनके खात्मे का एलान कर दिया गया था.

(यह रविश कुमार के ब्लॉग से लिया गया है)

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