किसान आंदोलन का सेंटीमेंट, बदलते समीकरण

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कृषि कानून के खिलाफ किसान आंदोलन का असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिलों में तेजी से फैल रहा है. जिसके चलते महापंचायतों का दौर शुरू हो गया है. भारतीय किसान यूनियन की पंचायत हो या फिर आरएलडी नेता जयंत चौधरी की महापंचायत सभी में किसानों की भारी भीड़ उमड़ रही है. मौके की नजाकत को समझते हुए कांग्रेस ने भी पश्चिमी यूपी में अपनी सियासी जुड़े जमाने की कवायद शुरू कर दी है.

कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी बुधवार को सहारनपुर के चिलकाना की किसान महापंचायत के जरिए पश्चिमी यूपी के समीकरण को साधने की कोशिश करेंगी. चौधरी अजीत सिंह के बेटे और आरएलडी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष जयंत चौधरी किसान महापंचायत के जरिए अपने खोए हुए राजनीतिक जनाधार को वापस लाने की लगातार कोशिश में जुटे हुए हैं.

अभी तक जयंत चौधरी करीब आधा दर्जन महापंचायत कर चुके हैं. यही वजह है कि कांग्रेस भी इस दिशा में सक्रिय हो गई है. हाल ही में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने दिल्ली की ट्रैक्टर परेड में हादसे का शिकार हुए किसान नवरीत सिंह के परिवार से रामपुर में मुलाकात की थी और अब सहारनपुर के किसान महापंचायत का सिलसिला शुरू कर रही है.

सहारनपुर में कांग्रेस सबसे ज्यादा मजबूत

यूपी में मौजूदा समय में कांग्रेस के 7 विधायकों में से दो के बागी रुख अपनाने के बाद पार्टी के पास 5 विधायक बचे हैं. कांग्रेस के 5 विधायकों में से 2 विधायक सहारनपुर जिले के हैं, जिनमें सहारनपुर देहात के मसूद अख्तर और बेहट से नरेश सैनी है. इतना ही नहीं 2019 में सहारनपुर लोकसभा सीट पर भी कांग्रेस को करीब 207000 वोट मिले थे. पश्चिमी यूपी में कांग्रेस सबसे ज्यादा मजबूत सहारनपुर जिले में मानी जाती है. जिसके चलते प्रियंका गांधी किसान महापंचायत का आगाज यहीं से कर रही हैं.

दिल्ली के करीब है पश्चिमी यूपी

दिल्ली से सटे होने के नाते पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक कांग्रेस के बड़े नेताओं का पहुंचना आसान है. साल 2009 के लोकसभा चुनाव में पश्चिमी यूपी के मेरठ मुरादाबाद रामपुर अलीगढ़ गाजियाबाद यहां तक कि मथुरा में भी कांग्रेस ने जीत हासिल की थी. साल 2013 के मुजफ्फरनगर दंगे के बाद पश्चिमी यूपी का समीकरण बिगड़ गया है और यहां बीजेपी ने अपना सियासी आधार मजबूत किया है. इसके बावजूद पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी का कोई बड़ा नेता पार्टी छोड़कर नहीं गया है.

पश्चिमी यूपी में मुसलमानों की आबादी 30 से 40 फ़ीसदी तक है. 2009 के लोकसभा चुनाव में मुस्लिमों ने कांग्रेस पर भरोसा जताया था. यहां की करीब तीन दर्जन विधानसभा सीटों पर मुस्लिम वोट निर्णायक भूमिका में है. वैसे ही जाट समुदाय भी दो दर्जन सीटों पर जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. 2013 के बाद जाट और मुस्लिमों के बीच दूरी होने का सियासी फायदा बीजेपी को मिला. C.A.A आंदोलन के दौरान हुए प्रदर्शन के बाद कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने पश्चिमी यूपी के तमाम जिलों में दौरा किया था और मुस्लिम समुदाय के लोगों से मिली थी.

पश्चिमी यूपी की 126 सीटों में से बीजेपी ने 102 सीटें जीती थी. जबकि सपा 20, कांग्रेस दो, बसपा 3 सीट दर्ज करने में कामयाब हुई थी. वही एक सीट पर आरएलडी को जीत मिली थी. किसान आंदोलन के चलते एक बार फिर जाट मुस्लिम सहित तमाम किसान जातियां एक साथ आ रही है और उनके बीच गहरी खाई को पाटने के लिए गांव-गांव दोनों समुदाय के लोग पंचायत भी कर रहे हैं. जाटों मुस्लिमों को अपने पाले में लाने की कवायद में आरएलडी से लेकर कांग्रेस तक जुट गई है.

चुनावी माहौल पश्चिमी यूपी से ही बनता है

यूपी विधानसभा हो या लोकसभा हर चुनाव में यही से पहले चरण के चुनाव का माहौल तय होता है. इसलिए सत्ताधारी पार्टी से लेकर विपक्षी पार्टियां पहले चरण में अपनी मजबूती बनाने के लिए पश्चिमी यूपी में पूरा दमखम लगाती हैं. ऐसे में माना जा रहा है कि प्रियंका गांधी किसानों के बीच अपनी पैठ बनाने के लिए महापंचायत की सभाएं पश्चिमी यूपी में शुरू कर रही है. जैसे यूपी के हर जिले की तहसीलों के बड़े गांव से जय जवान जय किसान के नाम से रैली की जाएगी.

कांग्रेस ने पश्चिमी यूपी में मजबूत जमीन बनाने के लिए कई बड़े नेताओं को कमान दी है. सहारनपुर में इमरान मसूद तो मुजफ्फरनगर में जाट समुदाय से आने वाले हरेंद्र मलिक और पंकज मलिक सक्रिय हैं. कांग्रेस इस अभियान से किसान जातियों खासकर हिंदू-मुस्लिम जाटों और गुर्जरों में मजबूत पकड़ बनाने की रणनीति पर काम कर रही है. कांग्रेस ने इस अभियान के तहत उन जिलों को प्राथमिक तौर पर टारगेट किया है जहां पर मजबूत किसान राजनीति का आधार रहा है.

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