लड़खड़ाते केजरीवाल और चुनाव में व्यस्त शाह के बीच

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कोविड-19 के रोज 20,000 से ज्यादा मामले आ रहे हैं, और वे बढ़ते ही जा रहे हैं. दिल्ली जबकि कोविड के सूनामी में डूब-उतर रही है, उसे काम करने वाली अपनी नेता की बहुत कमी महसूस हो रही है, पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित जैसी नेता की. लगता है, अरविंद केजरीवाल को तो समस्या की गहराई का अंदाजा ही नहीं है, और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों में चुनाव लड़ना.

इधर दिल्ली तबाह हो रही है. कठिन दौर में फंसी देश की राजधानी के लिए इसकी सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित, जिन्होंने आधुनिक दिल्ली की कल्पना की और उसे साकार किया और प्रशासन पर जिनकी जबरदस्त पकड़ थी, आज उसकी सबसे उपयुक्त त्राणदाता साबित हो सकती थीं.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल हालात को संभालने की जद्दोजहद कर रहे हैं, जैसी उन्होंने पिछले वर्ष आई कोविड की लहर में की थी. जिस अमित शाह ने उस समय महान उद्धारक की भूमिका निभाई थी, उनके लिए प्राथमिकताएं आज बदल गई हैं, वे नये इलाकों पर विजय हासिल करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और खुद को भारत के अजेय शासक घोषित करवाने में जुटे हैं.

प्रशासनिक अनुभव की कमी और क्रूर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के बीच फंसे दिल्ली के नागरिक वायरस की मार झेलने को मजबूर हैं. दिल्ली बिलकुल चरमरा गई है और उसे इससे उबारने वाला कोई नहीं है. कोरोना पॉज़िटिव मामलों की संख्या आसमान छू रही है. और पोजिटिविटी दर 30 प्रतिशत के आंकड़े को छू रही है. ऑक्सीजन की भारी कमी हो गई है और अस्पतालों में उपलब्ध आइसीयू बिस्तरों की संख्या 100 से भी नीचे पहुंच गई है. मिनट-दर-मिनट हालात बिगड़ रहे हैं. मुख्यमंत्री केजरीवाल केंद्र से बार-बार मदद की गुहार लगा रहे हैं.

हालात पिछले साल से बहुत भिन्न नहीं हैं. महामारी से केजरीवाल जिस तरह निबट रहे हैं वह उनकी सीमाएं और प्रशासन पर उनकी ढीली पकड़ उजागर कर रहा है. पिछले साल मैंने लिखा था.कोरोनावायरस से संबंधित आंकड़े में हेराफेरी करने से लेकर दिल्ली के अस्पतालों को केवल दिल्ली वालों के लिए आरक्षित करने तक, और स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने के लिए लॉकडाउन अवधि का इस्तेमाल न करने तक केजरीवाल वह सब कर रहे हैं जो उन्हें महामारी के दौरान नहीं करना चाहिए.

राष्ट्रीय राजधानी जब हालात पर काबू कर पाने में राजनीतिक नेतृत्व की अक्षमता के कारण तबाह हो रही थी, तभी परदे के पीछे छिपे अमित शाह अचानक दिल्ली के ‘सुपर चीफ मिनिस्टर’ के रूप में अवतरित हुए थे और मामले को अपने हाथ में लिया था, अस्पतालों के दौर किए थे, उनमें बेड बढ़वाए थे, टेस्टिंग की संख्या बढ़वाई थी और शहर को अपने पैरों पर खड़े होने में मदद की थी. लेकिन इस साल दिल्ली कहीं बड़े दुःस्वप्न में फंस गई है. कोविड मामलों की संख्या पिछले साल से लगभग तीन गुना ज्यादा है, और अस्पतालों में ऑक्सीजन और बेड की कमी के कारण स्थिति कहीं ज्यादा गंभीर है.

इसमें केजरीवाल की लाचारगी और अमित शाह की गैरहाजिरी जोड़ लीजिए. पिछले साल अमित शाह ने दिल्ली के मसीहा की भूमिका निभाते हुए चुस्त राजनीतिक कदम उठाया था, और केजरीवाल की छवि ऐसे नेता की बना दी थी जो संकट में प्रभावी नेतृत्व नहीं दे सकता. यह तब हुआ था जब अभीअभी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने भाजपा को विधानसभा चुनाव में शिकस्त दी थी. इस बार शाह अपनी राजनीति को लेकर दूसरी जगह व्यस्त हैं. और दिल्ली में चुनाव अभी बहुत दूर है. लेकिन केंद्र को दिल्ली के कोविड संकट को अपने हाथ में लेना चाहिए लेकिन मोदी और शाह के लिए तो इस समय प्राथमिकताएं दूसरी ही हैं, जिनमे देश की राजधानी शामिल नहीं है.

शीला की कमी

ऐसे समय में दिल्ली को एक समर्पित नेता की जरूरत है, जो स्थिति को अपने हाथ में लेकर काबू में कर सके. इसमें संदेह नहीं है कि केजरीवाल दिल्ली के प्रति प्रतिबद्ध हैं, लेकिन यह नहीं माना जा सकता कि वे इस अप्रत्याशित स्थिति को काबू में नहीं कर पा रहे हैं. अमित शाह नेतृत्व दे सकते हैं मगर राष्ट्रीय राजधानी के प्रति, या कहा जाए तो देश में कहीं भी कोविड संकट को संभालने के प्रति वे शायद ही कोई प्रतिबद्धता दिखाते हैं. इसलिए दिल्ली को शीला दीक्षित की कमी खल रही है. उनका राजनीतिक केरियर भले शानदार तरीके से खत्म न हुआ हो मगर उनके आलोचक भी उनकी प्रशासनिक क्षमताओं की तारीफ करते हैं. वे दिल्ली के विकास का चेहरा, बदली हुई दिल्ली का प्रतीक बन गई थीं, जो हरियाली, स्वच्छ हवा और बेहतर बुनियादी सुविधाओं के रूप में परिभाषित होती थी.

15 साल के उनके शासन में दिल्ली में करीब 70 फ्लाइओवर बने, सार्वजनिक बसें और ऑटोरिक्शा सीएनजी पर चलने लगे. शीला दीक्षित ‘विजन’ रखने वाली नेता थीं और उसे लागू करना भी जानती थीं. वे इच्छाशक्ति और ऐक्शन वाली नेता थीं और शासन पर पूरा नियंत्रण रखती थीं. दिल्ली और उसके लोगों से उनका लगाव इस प्रभावी कॉकटेल को और जबरदस्त बना देता था. बेशक, कुछ विफलताएं भी थीं. 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन उनके कार्यकाल का सबसे बुरा दौर था.

लेकिन आज हम जिस क्रूर और खतरनाक सच्चाई का सामना कर रहे हैं वैसे हालात में शीला दीक्षित जैसी नेता अपने हाथ में बागडोर संभाल कर सबको भरोसे में लेकर ले सकती थीं और लोगों को इस उयहलपूठा से मुक्ति दिला सकती थीं. फिलहाल, न तो मुख्यमंत्री केजरीवाल और न ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस चुनौती के लिए बने नज़र आते हैं, जो कि दिल्ली के मतदाताओं का दुर्भाग्य है, जिन्होंने विधानसभा चुनाव में केजरीवाल को 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह की भाजपा को जम कर वोट दिया था.

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