सूचना के अधिकार पर अब न्यायपालिका का वार

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सूचना के अधिकार ने देश में भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने और भ्रष्टाचारियों को जेल भेजने में मदद की. इस अधिकार ने सरकार को जबावदेह बनाने की दिशा में बड़ी भूमिका अदा की. आम आदमी से सरकारें डरने लगीं. सरकारों ने इस क़ानून को ख़त्म करने की हर कोशिश की. अब यह क़ानून दिल्ली हाईकोर्ट के एक फ़ैसले से पूरी तरह से बे-असर हो सकता है.

बेअसर हो जाएगा आरटीआई क़ानून

दिल्ली हाई कोर्ट का एक फ़ैसला हैरान करने वाला है, जिसके बाद सूचना का अधिकार (आरटीआई) क़ानून अब पूरी तरह बेअसर हो जाएगा और स्वतंत्र हैसियत वाला केंद्रीय सूचना आयोग एक आम सरकारी महकमे की तरह हो जाएगा, जिसका काम किसी भी सूचना को सार्वजनिक करने से इंकार करना ही रह जाएगा. आरटीआई क़ानून को कुंद करने की कोशिशें केंद्र सरकार के स्तर पर तो पहले से ही हो रही हैं, लेकिन अब इस क़ानून को पूरी तरह बेअसर बनाने की क़वायद पहली बार न्यायपालिका के स्तर पर हुई है.

दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले के मुताबिक़, अब सूचना के अधिकार के तहत सूचना माँगने वाले व्यक्ति को सूचना माँगने का मक़सद भी बताना होगा. अब तक क़ानूनी प्रावधान न होने के बावजूद भी कई मामलों में सरकार की ओर से जनहित या देशहित का हवाला देकर सूचना देने से इसी आधार पर इनकार किया गया है कि आवेदक ने सूचना माँगने का उद्देश्य स्पष्ट नहीं किया है.

क्या कहा है हाई कोर्ट ने?

दिल्ली हाई कोर्ट का यह फ़ैसला उस याचिका पर आया है, जिसमें आरटीआई के तहत केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) से राष्ट्रपति सचिवालय में हुई नियुक्तियों के संबंध में जानकारियाँ माँगी गई थीं. अदालत ने इस मामले में जानकारी न देने के सीआईसी के फ़ैसले को कायम रखते हुए याचिका दायरकर्ता यानी जानकारी माँगने वाले व्यक्ति पर 25 हज़ार रुपए का जुर्माना भी लगाया है. दिल्ली हाई कोर्ट का यह फ़ैसला साफ तौर पर आरटीआई क़ानून की मूल भावना के ख़िलाफ़ है और साथ ही इस क़ानून को पूरी तरह बेअसर बनाने वाला न्यायिक कदम भी, जो कि देश की आजादी के 58 वर्षों बाद देश के नागरिकों को हासिल हुआ था. 1975 के बाद अलग-अलग मुक़दमों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सूचना का अधिकार एक मूलभूत अधिकार है, इसलिए इसको लेकर क़़ानून बनाया जाए. कई स्वयंसेवी संगठनों ने इस क़ानून को बनाने की माँग को लेकर आंदोलन भी किए. लंबी जद्दोजहद के बाद वर्ष 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार ने इस क़ानून को पारित भी करा लिया था लेकिन इसे लागू नहीं किया गया था.

वजह बताने की ज़रूरत नहीं थी

2005 में डॉ. मनमोहन सिंह की अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने इस क़ानून को संसद से पारित भी कराया और इसे लागू भी किया. संसद में जब यह क़ानून पारित किया गया था, तो उसमें विशेष तौर पर धारा 6(2) शामिल की गई थी. इस धारा के मुताबिक़, सूचना के लिए आवेदन करने वाले व्यक्ति को इसके लिए कोई वजह देने की ज़रूरत नहीं होगी. दिल्ली हाई कोर्ट ने अपने फ़ैसले में धारा 6(2) पर सीधे तो कोई टिप्पणी नहीं की है लेकिन इतना साफ है कि इस फैसले से ये क़ानून कुंद हो जायेगा. आरटीआई क़ानून की इस धारा को लेकर पहले भी सवाल उठाए गए हैं, जिन पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सूचना के अधिकार को नागरिकों के एक मौलिक अधिकार के रूप में परिभाषित किया है.

सर्वोच्च अदालत ने साफ किया है कि इस क़ानून का इस्तेमाल करने यानी कोई जानकारी माँगने के लिए किसी को उसकी वजह बताने की ज़रूरत नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक़, सूचना का अधिकार एक मौलिक अधिकार है और यह भारत में जन्मे हर नागरिक को प्राप्त है. पारिभाषिक तौर पर देखा जाए तो मौलिक अधिकार का अर्थ है कि अधिकार में कोई शर्त निहित नहीं है. यानी किसी भी व्यक्ति को अपने मौलिक अधिकारों के इस्तेमाल के लिए उसकी वजहें बताने की ज़रूरक नहीं है. इस व्यवस्था के आधार पर सूचना के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)ए में प्रदत्त भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 में वर्णित जीवन के अधिकार के तहत सुप्रीम कोर्ट से मान्यता प्राप्त है.

सुप्रीम कोर्ट के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट का फ़ैसला

ज़ाहिर है कि दिल्ली हाई कोर्ट का आदेश आरटीआई कानून की मंशा के ख़िलाफ़ होने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए आदेशों को भी नज़रअंदाज़ करता है, जो कि अपने आप में एक अभूतपूर्व घटना है. अब तक तो होता यह रहा है कि कई मामलों में हाई कोर्टों के फैसलों को सुप्रीम कोर्ट पलटता रहा है, लेकिन देश के न्यायिक इतिहास में यह पहला मौका जब किसी मामले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व में दिए गए आदेश के विपरीत किसी हाई कोर्ट ने आदेश दिया है. अब दिल्ली हाई कोर्ट का यह फ़ैसला तब तक नज़ीर बना रहेगा जब तक कि सुप्रीम कोर्ट इसे पलट न दे. लेकिन पिछले कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट जिस तरह महत्वपूर्ण मामलों में सरकार के अनुकूल फ़ैसले दे रहा है, उसे देखते हुए ज्यादा संभावना इसी बात की है कि सुप्रीम कोर्ट के पास जब भी यह मामला जाएगा तो उसका भी फ़ैसला दिल्ली हाई कोर्ट के फ़ैसले से अलग नहीं होगा. वैसे भी गृह मंत्री अमित शाह और क़ानून मंत्री रविशंकर प्रसाद 2०18 में सबरीमाला मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के वक़्त ही कह चुके हैं कि अदालतें फ़ैसले ऐसे दे कि जिन पर सरकारें अमल कर सके और लोगों से भी करवा सकें.

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