यह रणनीतिक साझेदारी किस हद तक खतरनाक हो सकती है भारत के लिए?

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भारत के खिलाफ पाकिस्तान और तुर्की की यारी के बारे में दुनिया जानती है. भारत के खिलाफ पाकिस्तान की हर चाल को तुर्की ने पिछले कुछ सालों में समर्थन दिया है. अभी तक हर मोर्चे पर पाकिस्तान को चीन का समर्थन और मदद दोनों मिलती थी. लेकिन अब तुर्की से भी मिलने लगी है. भारत के लिए टेंशन और बढ़ सकती है.

ऐसा इसलिए क्योंकि चीन और तुर्की की नजदीकी भी बढ़ रही है. मध्य पूर्व में तुर्की और चीन के हित साझे हैं. इसलिए भी चाइना और तुर्की के बीच नजदीकियां बढ़ रही है. लेकिन इस जुगलबंदी में रूस भी शामिल हो रहा है. हाल ही में रूस के विदेश मंत्री ने बयान दिया था कि पश्चिमी देश भारत को चीन के खिलाफ मोहरे के तौर पर इस्तेमाल कर रहे हैं.

इसका मतलब यह हुआ कि रूस भी नहीं चाहता है कि चीन के खिलाफ कोई वैश्विक गोलबंदी खड़ी हो और उसमें भारत शामिल हो. रूस और चीन तो पहले से ही एक दूसरे के करीब थे लेकिन अब इस गठजोड़ में तुर्की और पाकिस्तान भी शामिल हो गए हैं. रूस पाकिस्तानी सेना के साथ सैन्य अभ्यास कर रहा है और वहां एलएनजी पाइपलाइन भी बना रहा है. रूस और तुर्की के बीच सैन्य सहयोग लगातार बढ़ रहा है.

चीन और तुर्की के बीच भी रणनीतिक साझेदारी दिन प्रतिदिन बढ़ रही है. ऐसे में यह भारत के लिए चिंता का सबब हो सकता है. आपको बता दें कि एक ऐसा वक्त भी था जब तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दवान चीन में वीगर मुसलमानों के साथ दुर्व्यवहार को लेकर बहुत ही मुखर हुआ करते थे. वीगर मुसलमान की अधिकतम आबादी चीन के शिनजियांग प्रांत में रहती है और उनकी भाषा टर्कीश है.

आपको बताा दें कि बिगर मुसलमानों के मानवाधिकार उल्लंघन को लेकर चीन की सरकार की लगातार आलोचना होती रही है. इस आलोचना में तुर्की भी शामिल हुआ करता था. रेचेप तैय्यप एर्दवान 2019 में तुर्की के प्रधानमंत्री हुआ करत थे. तब उन्होंने कहा था कि चीन वीगर मुसलमानों के साथ जो कर रहा है वह वह सीधे तौर पर नरसंहार है. तुर्की केवल अपने बयानों में ही वीगर मुसलमानों के साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ सिर्फ आवाज नहींं उठाता था बल्कि चीन से भागे कई वीगर मुसलमानोंं को पनाह भी देता था.

लेकिन अब अचानक से तुर्की के रुख में बदलाव देखने को मिल रहा है. तुर्की और चीन के बीच लगातार नजदीकी बढ़ रही है. एर्दवान इस्लामिक दुनिया के नेतृत्व की भूमिका में आने की महत्वकांक्षी रखते हैं और मुसलमानों से जुड़े मुद्दे को लेकर भी कोई मौका अपने हाथ से नहीं जाने देते. कश्मीर को लेकर भी एर्दवान लगातार बयानबाजी करते रहते हैं और पाकिस्तान को खुलकर समर्थन करते रहते हैं. लेकिन वीगर मुसलमानों को लेकर एक एर्दवान चुप हैं. एर्दवान अब चीन से नजदीकी बढ़ा रहे हैं और वे इस मुद्दे पर बोलकर चीन को नाराज नहीं करना चाहते हैं.

19 दिसंबर को तुर्की और चीन के बीच पहली ट्रेन भी चली है. ये मालगाड़ी तुर्की से सामान लेकर चीन पहुंची है. इसे भी दोनों देशों के संबंधों में ऐतिहासिक कदम करार दिया जा रहा है. ये ट्रेन 4 दिसंबर को इंस्तांबुल से चली थी और जॉर्जिया, अजरबैजान, कैस्पियन सागर और कजाकिस्तान से गुजरते हुए कुल 8693 किमी की दूरी तय करके चीन के शियान शहर पहुची. रविवार को यानी 20 दिसंबर को हॉन्ग कॉन्ग और तुर्की ने भी एक समझौता किया है जिसके तहत तुर्की के लोगों को हॉन्ग कॉन्ग के जहाजों में काम करने की अनुमति होगी.

स्वास्थ्य क्षेत्र में भी चीन और तुर्की के बीच सहयोग बढ़ा है. इसी सप्ताह, चीन की कोरोना वायरस की सिनोवैक वैक्सीन की 30 लाख खुराक तुर्की पहुंचेगी. तुर्की ने चीनी वैक्सीन की 50 मिलियन डोज की खरीद के लिए चीन के साथ एक समझौता किया है. पश्चिम एशिया और यूरोप में चीन के विस्तार की चाहत एर्दवान के लिए लाइफलाइन की तरह बनकर आई है. दोनों देशों के बीच बढ़ता सहयोग इसका सबूत है.

साल 2016 से लेकर अब तक दोनों देशों ने करीब 10 द्विपक्षीय समझौतों पर हस्ताक्षर किए हैं. इनमें स्वास्थ्य से लेकर परमाणु ऊर्जा से भी जुड़े समझौते शामिल हैं. रूस के बाद, चीन तुर्की से सबसे ज्यादा आयात करने वाला देश है. चीन ने साल 2016 से लेकर साल 2019 के बीच तुर्की में करीब 3 अरब डॉलर का निवेश किया है और अगले साल तक इसे दोगुना करने का लक्ष्य है.

इस मुश्किल वक्त में चीन से आ रहा निवेश एर्दवान के लिए बहुत ही अहमियत रखता है. जब साल 2018 में लीरा की मुद्रा में 40 फीसदी की गिरावट आई तो चीन के सरकारी बैंक ने ऊर्जा क्षेत्र की परियोजनाओं के लिए 3.6 अरब डॉलर कर्ज दिया था. जून 2019 में जब इस्तांबुल में स्थानीय चुनाव में एर्दवान कमजोर पड़ रहे थे, उसी वक्त चीन के केंद्रीय बैंक ने एक पुराने समझौते का नवीनीकरण करते हुए 1 अरब डॉलर की आर्थिक मदद दी थी.

इस साल भी जब कोरोना वायरस की महामारी की वजह से एर्दवान की लोकप्रियता में भारी गिरावट हुई और तुर्की विदेशी मुद्रा भंडार निचले स्तर पर था, चीन मदद के लिए आगे आया. बीजिंग ने व्यापारिक भुगतान के लिए तुर्की कंपनियों को चीनी मुद्रा युआन के इस्तेमाल की इजाजत दी है. चीन की बेल्ट ऐंड रोड परियोजना से तुर्की को फ़ायदा हो रहा है तो दूसरी तरफ, बीजिंग को इस परियोजना के तहत भूमध्यसागर में पैर जमाने का मौका मिल रहा है.

तुर्की ने चीन की मदद से पूर्वी इलाके में कार्स से लेकर तब्लीसी, जॉर्जिया और अजरबैजान से होते हुए कैस्पियन सागर तक एक रेल रोड का निर्माण किया है. इस साल, चीन की एक्सपोर्ट ऐंड क्रेडिट इंश्योरेंस कॉरपोरेशन ने तुर्की में बीआरआई परियोजनाओं में 5 अरब डॉलर का निवेश करने का वादा किया है. हालांकि, इस फंड को लेकर पारदर्शिता नहीं बरती जा रही है जिससे लोगों के मन में आशंका है कि तुर्की इस कर्ज का भुगतान कर भी पाएगा या नहीं.

चीन की हुवावे कंपनी जिसे अमेरिका ने राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा करार दिया है, तुर्की के बाजार में इसकी हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है. साल 2017 में तुर्की के बाजार में इसकी 3 फीसदी की हिस्सेदारी थी जो साल 2019 में बढ़कर 30 फीसदी तक पहुंच गई है. चीन और तुर्की दोनों को ही गहराते रिश्तों से फायदा है.

तुर्की चीन के लिए रणनीतिक रूप से काफी अहमियत रखता है. NATO का सदस्य तुर्की, ऊर्जा, रक्षा, तकनीक और टेलिकॉम्युनिकेशन का बड़ा बाजार है. तुर्की तीनों महाद्वीपों एशिया, यूरोप और अफ्रीका को जोड़ता है. वहीं, तुर्की और एर्दवान के लिए, चीन भारी-भरकम निवेश का स्रोत है जो उसकी गिरती अर्थव्यवस्था के बावजूद विकास कार्य को जारी रखने में मदद कर रहा है.

चीन की वजह से एर्दवान को पश्चिमी देशों के दबदबे वाले अंतरराष्ट्रीय संगठनों से मदद भी नहीं मांगनी पड़ रही है. अगर तुर्की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से मदद लेता है तो उसे अपनी अर्थव्यवस्था में कई तरह के सुधार लाने होंगे. जाहिर है कि एर्दवान तुर्की की अर्थव्यवस्था पर अपने नियंत्रण को किसी भी सूरत में कमजोर नहीं करना चाहते हैं.

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