करना क्या चाहती है बीजेपी और ई. श्रीधरन?

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E. Sreedharan

मेट्रो मैन ई. श्रीधरन को देश में कौन नहीं जानता? जितने भी पढ़े-लिखे और समझदार लोग हैं, उन्हें पता है कि दिल्ली, कोलकाता और कोंकण में मेट्रो और रेल लाइन का चमत्कार कर दिखाने वाले सज्जन का नाम क्या है. दिल्ली की मेट्रो ऐसी है, जैसी कि दुनिया की कोई भी मेट्रो है. जापानी मेट्रो की तेज गति को छोड़ दें तो भारत की मेट्रो शायद दुनिया की सबसे बढ़िया मेट्रो मानी जाएग. इसका श्रेय उसके चीफ इंजीनियर श्री श्रीधरन को है.

अब वे 21 फरवरी के दिन बीजेपी में प्रवेश लेंगे. राजनीति में उनका यह प्रवेश उनकी मर्जी से हो रहा है. उन पर किसी का कोई दबाव नहीं है. उन्होंने जब तक सरकारी नौकरी की, तब तक उनका जीवन इतना स्वच्छ रहा है कि उन्हें किसी आरोप से बचने के लिए किसी सत्तारुढ़ पार्टी की शरण में जाने की जरूरत भी नहीं है. फिर भी 88 साल की आयु में वे बीजेपी में क्यों शामिल हो रहे हैं?

ई. श्रीधरन का कहना है कि वे केरल में रहते हैं और वहां की कम्युनिस्ट सरकार ठीक से काम नहीं कर रही है. मई-जून में होने वाले प्रांतीय चुनाव में वह हारेगी. वे चुनाव भी लड़ेंगे. श्रीधरनजी से सवाल यह है कि राजनीति के कीचड़ में कूदकर क्या वे देश का ज्यादा भला कर सकेंगे? उन्होंने जिन प्रदेशों में मेट्रो और रेल बनाई और नाम कमाया, उनमें क्या उस समय बीजेपी की सरकारें थीं? उनके लिए तो सभी पार्टियां बराबर हैं.

वे अपने आपको किसी एक पार्टी की जंजीर में क्यों जकड़ रहे हैं? वे तो सबके लिए समान रूप से सम्मानीय हैं. उनका सम्मान देश के किसी भी नेता से कम नहीं है. देश और दुनिया के कई बड़े से बड़े नेताओं को हमने कुर्सी छोड़ते ही इतिहास के कूड़ेदान में पड़े पाया है. श्रीधरनजी जैसे लोग यदि उनकी श्रेणी में शुमार होने लगें तो हमें अफसोस ही होगा. इससे बड़ा सवाल यह है कि बीजेपी को यह कौन सा ताजा बुखार चढ़ा है?

लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, शांताकुमार, सुमित्रा महाजन जैसे निष्कलंक और दिग्गज बीजेपी नेताओं को तो आपने घर बिठा दिया है, क्योंकि वे 75 साल से ज्यादा के हैं तो मैं पूछता हूं कि भाई-लोग, आप गणित भूल गए क्या? क्या 88 का आंकड़ा 75 से कम होता है? श्रीधरनजी के कंधे पर सवार बीजेपी को केरल में वोट तो ज्यादा ज़रूर मिलेंगे लेकिन उनका कद छोटा हो जाएगा. एक राष्ट्रीय धरोहर, पार्टी-पूंजी बन जाएगी.

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