‘तीरथ यात्रा’ खत्म होने के मायने क्या है?

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चार धाम कैंसिल की तरह ‘तीरथ यात्रा’ चार महीने पूरा होने के पहले खत्म. तीरथ सिंह रावत ने राज्यपाल को इस्तीफा सौंप दिया है. अब पूछने को यही रह गया है कि आचार, विचार और विश्व विजय को निकली पार्टी से देवभूमि संभल क्यों नहीं रही?

तीरथ सिंह रावत जा रहे हैं तो उनके जाने का उत्तराखंड और बीजेपी के लिए मतलब क्या है? कहने को तो यही कहा जाएगा कि रावत को सांसद से सीएम बनाया गया था. सीएम बने रहें इसलिए विधायक बनना जरूरी थी, वो भी 6 महीने के अंदर. वो 6 महीने सितंबर में खत्म होने वाले हैं.

दिक्कत ये है कि चुनाव आयोग ने कोरोना के कारण चुनाव रोक रखा है. तो रावत को जाना पड़ा. कहने की बात होगी. उपाय निकल सकता था. किसी राज्य में संवैधानिक संकट पैदा हो रहा है तो केंद्र सरकार उपाय निकाल सकती है. चुनाव आयोग को कह सकती है. तो क्यों नहीं कहा?

तीरथ से पहले त्रिवेंद्र थे. कुंभ के महाआयोजन में कोरोना के कुछ नियम लागू कराना चाहते थे. छोटे राज्य में छोटा विरोध तो हो ही रहा था, वृहद वोटबैंक के खफा होने का डर था. सो त्रिवेंद्र की बलि ले ली गई. तीरथ आए और ‘छा’ गए. बोले कुंभ में कोई भी आए, कैसे भी आए, कोई नियम कानून नहीं.

मुख्यमंत्री बनते ही, कुंभ के भव्य आयोजन का ऐलान कर दिया. दो महीने पहले से बनाई गई तमाम गाइडलाइंस को दरकिनार कर दिया. देश और दुनियाभर के लोगों को बिना किसी पाबंदी के कुंभ में स्नान करने का न्योता दिया. कुंभ में कोरोना नेगेटिव आरटीपीसीआर रिपोर्ट के नियम को भी खत्म करने की कोशिश की.

वो तो गनीमत है, न्यायपालिका ने जनता की जान बचाई, हाईकोर्ट ने कड़ी फटकार लगाई और इस फैसले पर ब्रेक भी. दूसरी लहर के कहर के बावजूद कुंभ पूरा कराने की जिद पर अड़े थे रावत. ये भी कहा था- कुंभ में गंगा मैया की कृपा से नहीं होगा कोरोना. अब पता चल रहा है कि कुंभ में एक लाख से ऊपर फर्जी टेस्ट कराए गए.अब कोई शक नहीं रह गया है कि कुंभ कोरोना सुपर स्प्रेडर इवेंट रह गया है.

कोढ़ में खाज अंदाज में रावत का वो बयान भी आया कि कटी फटी जींस पहनने वाली महिलाएं बच्चों को क्या संस्कार देंगी? कभी कहने लगे कि ज्यादा राशन चाहिए तो 20 बच्चे पैदा करो, कभी खोज निकाला कि भारत को अमेरिका ने 200 साल तक गुलाम बनाया था. बहुत थू-थू हुई. प्रगतिशील पीएम का ऐसा पिछड़ा सीएम. बहुत गलत बात है. ये गलत बातें उत्तराखंड की जनता भी समझती है. चंद महीनों बाद वहां चुनाव है.

‘तीरथ’ ने तीरथ में जो रायता फैलाया है, उसकी सजा के रूप में वोटर बीजेपी का शामियाना समेट सकती है, इसलिए ये भूलसुधार किया जा रहा है? लेकिन असली सवाल ये है तीरथ नाम की भूल किसकी थी-रावत को तख्त पर बिठाया किसने था? रावत कोई चुनाव जीतकर अपने बल बूते तो गद्दीनशीन हुए नहीं थे. रावत ने जिन मोदी को भगवान का दर्जा दे दिया था, क्या ये सब उनकी सहमति के बिना हो रहा था?

आखिर आलाकमान की मर्जी के बिना उत्तराखंड में सत्ता परिवर्तन तो नहीं हुआ होगा? सवाल ये भी इस भूल सुधार की ऐसी क्या जरूरत-जल्दी आन पड़ी. पूरा देश मुट्ठी में करने निकले ‘देवों’ से देवभूमि का छोटा सा कुनबा कंट्रोल नहीं हो रहा? संघ के आदमी माने जाने वाले तीरथ को भी जाना पड़ रहा है. उत्तराखंड में इतना झगड़ा, इतना भय?

उत्तराखंड का मालिक कौन है? पहाड़ या दिल्ली दरबार? छह महीने के अंदर तीसरा सीएम. राज्य के साथ खिलवाड़ नहीं तो क्या है? सवाल ये भी है कि भूल सुधार के रूप में जिन अनिल बलूनी, सतपाल महाराज, रमेश पोखरियाल निशंक की चर्चा चल रही है, क्या जनता उनके दर्शन से ‘डर्टी पिक्चर’ भुला देगी?

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