भारत को क्यों एक और टीएन शेषन की जरूरत है?

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Ashok-Lavasa

भारत का निर्वाचन आयोग और उसके सदस्य मौजूदा विधानसभा चुनावों के दौरान अपने (गलत) आचरण के कारण लगातार आलोचनाओं के घेरे में हैं. कुछ अपवादों को छोड़कर, लगभग सभी लोगों—अब तो एक एक हाई कोर्ट ने भी—ने कोविड-19 महामारी के दौरान चुनाव आयोग की निष्क्रियता की निंदा की है.

चुनावी रैलियां कोविड फैलने के लिए बड़े पैमाने पर जिम्मेदार रही हैं. चुनाव आयोग को इस गरिमामय संस्था के प्रति असम्मान का भाव पैदा करने के बजाये चुनाव को लेकर उपजे उतावलेपन को नियंत्रित करना चाहिए था और वह इस पर नियंत्रण कर सकता था.

भारत का निर्वाचन आयोग (ईसीआई) एक संवैधानिक निकाय है और मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) को महाभियोग की प्रक्रिया के बिना उनके पद से हटाया नहीं जा सकता है. इस प्रकार, इसे पर्याप्त सुरक्षा मिली हुई है. यही कारण है कि लगातार सभी चुनाव आयुक्तों ने इसका मान कायम रखा है और संस्था को और मजबूत किया है. कम से कम किसी सीईसी के लिए तो इसकी गरिमा घटाने का कोई कारण नहीं है. या, हम तो ऐसा ही सोचते हैं.

आदेशों को मानना है या नहीं मानना है

जनवरी 2018 से अगस्त 2020 तक ईसीआई के सदस्य रहे अशोक लवासा के साथ जो हुआ, उसने शायद यह सब बदल दिया. उन्हें निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए चुनाव आयुक्त बनाया गया था. यह पद हासिल करने के बाद लवासा ने निश्चित तौर पर कुछ मुद्दों पर एक ‘स्वतंत्र’ दृष्टिकोण अपनाने का फैसला किया. अचानक, उनके परिवार के सदस्यों के खिलाफ मामले खुलने लगे, और बाद में क्लीयर हो गए. एक महत्वपूर्ण समय पर जब कुछ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले थे, सबसे वरिष्ठ होने के नाते लवासा सीईसी पद के लिए तार्किक विकल्प होते. वह कुछ समय दुविधा में रहे लेकिन आखिरकार लड़ाई आगे न बढ़ाने का फैसला किया और एशियाई विकास बैंक का हिस्सा बनने के लिए चले गए. संदेश एकदम साफ और स्पष्ट था.

यह तय करना तो मुश्किल है कि अशोक लवासा मामले ने चुनाव आयुक्तों को ‘आदेश पालक’ बनने की दिशा में धकेलने में कितना योगदान दिया है. चुनाव आयुक्तों के स्तर पर इस तरह का (गलत) आचरण किए जाने के पीछे अन्य फैक्टर इतने ज्यादा थे कि मद्रास हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीब बनर्जी और जस्टिस सेंथिलकुमार राममूर्ति की पीठ को सोमवार को ईसीआई के खिलाफ निम्न आदेश देना पड़ा- ‘आप केवल एक संस्थान हैं जो आज की स्थिति के लिए जिम्मेदार हैं. कोर्ट के तमाम आदेशों के बावजूद रैलियां करने वाले राजनीतिक दलों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई. आपके चुनाव आयोग पर तो हत्या के आरोप लगाए जाने चाहिए.’

निश्चित तौर पर ये शब्द बेहद कड़े हैं. दशकों से संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों को उनके अपना कार्यकाल पूरा कर लेने के बाद पुरस्कृत करने की परिपाटी चलती आ रही है. इसके लिए केवल मौजूदा व्यवस्था को दोष देना गलत होगा. तमाम न्यायाधीशों और सिविल सेवकों को इस गलत चलन से ‘लाभ’ मिल रहा है.

ईसीआई के संदर्भ में एक अलग ही किस्म का मामला सामने है जिसमें एक पूर्व सीईसी एक राजनीतिक दल में शामिल हुए और फिर केंद्रीय मंत्री बनाए गए. मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि पूर्व सीईसी सुनील अरोड़ा, जिन्होंने इसी माह अपना कार्यकाल पूरा किया है, को गोवा का राज्यपाल बनाया जा सकता है. ऐसे में कोई भी केवल यह उम्मीद ही कर सकता है कि ऐसा न हो, अन्यथा यह उन पर अपने कार्यकाल के दौरान पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाने के आरोपों को विश्वसनीयता ही प्रदान करेगा.

चुनाव आयोग सिविल सेवाओं का नाम खराब कर रहा

निर्वाचन आयोग की तरफ से से लिए जाने वाले निर्णय काफी हद तक कठिन और संवेदनशील होते हैं. यह हर किसी को खुश नहीं कर सकता. तथ्यात्मक रूप से इसके फैसले किसी को खुश करने या नाखुश करने के लिए होने भी नहीं चाहिए. ईसीआई का काम चुनाव प्रक्रिया को निष्पक्ष तौर पर पूरा करना होता है. यही वो वजह है जिसने इस प्रतिष्ठित संस्था की गरिमा कायम की है और जिसके लिए इसे जाना जाता है.

ईसीआई की निष्पक्षता पर अब से पहले कभी इतने सवाल नहीं उठे. पश्चिम बंगाल में चुनाव कराने को लेकर जैसी रणनीति बनाई गई है और जिस तरह से उस पर अमल किया गया, उसने सभी को हैरत में डाल दिया है. ऐसे समय में जबकि देश एक अभूतपूर्व स्वास्थ्य संकट का सामना कर रहा है, राज्य में आठ चरणों में मतदान कराने पर सवाल उठते रहे हैं. चुनाव आयोग की तरफ से कोविड संबंधी मानदंडों के उल्लंघन पर भी आंखें मूंदें रहने और बेरोकटोक चुनावी रैलियां होने देने ने भी हर किसी को चौंका दिया है.

चुनाव आयोग इस सबको बेहतर ढंग से प्रबंधित कर सकता था और उसे करना चाहिए था. चुनाव आयोग का काम काफी कठिन और अवांछनीय होता है. लेकिन ये तो हमेशा से ही ऐसा ही रहा है. और, यह हमेशा ही अपना सिर ऊंचा रखने में कामयाब रहा है. क्या अशोक लवासा के मामले ने सब कुछ बदल दिया? या, फिर क्या चुनाव आयुक्त भी अतिरिक्त पुरस्कार की अपेक्षा करने लगे हैं? मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि चुनाव आयुक्त संस्था की पवित्रता और विश्वसनीयता को बहाल करना चाहते होंगे.

लेकिन ऐसा करने के लिए, उन्हें सबसे पहले यह स्वीकार करना होगा कि कहीं तो कुछ गड़बड़ है. और अगर वे यह स्वीकार भी कर लेते हैं, तो सबसे अहम सवाल यह है कि क्या उनमें इतनी दृढ़ता है कि जो उनकी नजर में सही, उसे कर पाएंगे. टी.एन. शेषन ने अपने समय में वही किया, जो उन्हें सही लगा और उसके लिए उन्हें नए कानून की जरूरत नहीं थी. उन्होंने मौजूदा नियम-कानूनों का ही इस्तेमाल करके इसके ढांचे को मजबूत किया. हालांकि, इसके लिए हिम्मत और सही दृष्टिकोण की जरूरत थी. क्या मौजूदा चुनाव आयुक्तों में शेषन जैसी हिम्मत और दृष्टिकोण है?

कुछ लोगों का तर्क है, शायद वे गलत हो सकते हैं, कि वे वहां नहीं होते जहां वे हैं अगर उनमें इसी तरह की विशेषताएं होतीं. इस तथ्य के बावजूद कि बड़ी संख्या में सिविल सेवक कोविड-19 महामारी से निपटने में जी-जान से जुटे हैं, उनके बारे में सामान्य धारणा उन लोगों ने बनाई है, जो चुनाव आयुक्त जैसे उच्च-पदों पर आसीन हैं. मौजूदा उदाहरणों के साथ चुनाव आयुक्तों की (अ)कर्मणता और पक्षपातपूर्ण रवैये ने सिविल सेवाओं का नाम खराब किया है,

हालांकि ये अपवाद हैं. बृहन्मुंबई महानगर पालिका आयुक्त जैसे कई अन्य आयुक्त हैं, जो पद के लिहाज से भले ही कमतर स्थिति में आते हों, लेकिन अनुकरणीय नेतृत्व गुणों और बिना किसी लालसा के कड़ी मेहनत के जरिये तस्वीर बदलने मे जुटे हैं. निश्चित तौर पर हर तरह के सिविल सेवक होते हैं. यदि अधिकारियों की पोस्टिंग के लिए व्यवहार्यता और निष्ठा प्रमुख मानदंड बन जाएगी तो हमें ऐसे अधिकारी मिलेंगे जो सिविल सेवाओं का नाम खराब करते हैं. हालांकि, यदि ईमानदारी और दक्षता को मानदंड बनाया जाए तो हमारे पास तमाम शेषन और रिबेरो होंगे. विकल्प चुनना तो नीति निर्माताओं के हाथ में है. लेखक एक सेवानिवृत्त सिविल सेवक है और भारत सरकार में पूर्व सचिव रहे हैं. व्यक्त विचार निजी हैं.

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