BJP के लिए गले की हड्डी क्यों बन गए हैं किसान

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सितंबर 2020 में जब संसद से तीन नए कृषि कानून पास हुए तबकिसानों का विरोध-प्रदर्शनखासकर पंजाब और हरियाणा में ही होता रहा. केंद्र की BJP सरकार भी समझती रही कि पंजाब-हरियाणा के चावल और गेहूं उत्पादक नाराज हैं लेकिन जैसे ही इन किसानों ने दिल्ली कूच किया और दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाला, आंदोलन व्यापक हो चला.

26 जनवरी तक किसानों ने भी अपने आंदोलन को सियासी दलों से दूर रखा लेकिन गणतंत्र दिवस पर हिंसा और गाजीपुर बॉर्डर पर बदली परिस्थितियों के बाद राजनीतिक पार्टियों की सीधे तौर पर इसमें एंट्री हो गई. यूपी की मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी से लेकर मायावती की बहुजन समाज पार्टी, किसानों और जाटलैंड में विशेष पकड़ रखने वाला राष्ट्रीय लोक दल, कांग्रेस और भीम आर्मी के चंद्रशेखर समेत कई ने इसे अपना समर्थन दिया.

अब यह आंदोलन पंजाब, हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सभी जिलों तक पहुंच चुका है. पश्चिमी यूपी के जाट किसान इस आंदोलन की जड़़ में हैं. यह BJP के लिए चिंता की बात है क्योंकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में 44 विधानसभा सीटें हैं और उनमें से 20-22 सीटों पर जाट वोटर हार-जीत तय करते हैं. आंकड़ों पर गौर करें तो 2017 के यूपी विधान सभा चुनावों में BJP को कुल 41 फीसदी वोट मिले थे लेकिन पश्चिमी यूपी में BJP को करीब 44 फीसदी वोट मिले थे. 2019 के लोकसभा चुनावों में भी यूपी में BJP को कुल 50 फीसदी वोट मिले थे लेकिन पश्चिमी यूपी में उसे 52 फीसदी वोट मिले थे. 2014 के लोकसभा चुनाव के आंकड़ों पर भी गौर करें तो पूरे यूपी में BJP को 42 फीसदी वोट मिले थे लेकिन पश्चिमी यूपी में यह आंकड़ा 50 फीसदी था.

हालांकि, यूपी विधानसभा चुनाव में अभी एक साल का वक्त है. वहां 2022 के शुरू में चुनाव होने हैं. बावजूद BJP के लिए यह चुनौतीपूर्ण हो सकता है और उसे इसके नुकसान उठाने पड़ सकते हैं क्योंकि गन्ना पैकेज के बावजूद किसानों को गन्ने की बढ़ी कीमत नहीं मिल रही. अगर किसानों ने आंदोलन लंबा खींचा तो सत्ताधारी BJP को कई मोर्चों पर नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसका असर पड़ोसी राज्य उत्तराखंड पर भी पड़ सकता है. वहां भी 2022 में चुनाव होने हैं.

हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर पहले ही किसानों का विरोध-प्रदर्शन झेल चुके हैं और उन्हें अपनी सभा रद्द करनी पड़ी है. डेढ़ साल पहले ही सत्ता पर कब्जा पाने वाले खट्टर की पकड़ वहां कमजोर होती दिखी. इसकी मुख्य वजह किसान आंदोलन ही है. हरियाणा में हालिया निकाय चुनावों में किसान आंदोलन की वजह से ही BJP और जेजेपी गठबंधन को नुकसान उठाना पड़ा है. मुख्यमंत्री खट्टर भी कह चुके हैं कि किसान आंदोलन की वजह से ही पार्टी की हार हुई है. फिलहाल, वहां चुनाव नहीं है.

पंजाब में भी अगले साल विधान सभा चुनाव होने हैं. कृषि कानून के मुद्दे पर पहले से ही वहां एनडीए टूट चुका है. अब BJP और अकाली दल की राहें अलग हो चुकी है. BJP वहां एकला चलो की राह टटोल रही है. अब तक छोटे भाई के तौर पर BJP अकाली दल के साथ ही चुनाव लड़ती रही थी. उधर, आम आदमी पार्टी और सत्ताधारी कांग्रेस पहले दिन से ही किसानों का समर्थन करती रही है. सीएम अमरिंदर सिंह भी फूंक-फूंककर कदम उठा रहे हैं. पंजाब के किसानों ने जिस तरह से हरियाणा बॉर्डर और दिल्ली बॉर्डर पर प्रदर्शन किए, उससे पांच नदियों के इस प्रदेश में BJP को नुकसान उठाना पड़ सकता है.

किसान आंदोलन का प्रभाव पूरे देश में भी पड़ने की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता. 2022 में हिमाचल प्रदेश और गुजरात में भी चुनाव होने हैं, और वहां भी BJP सत्ता में है. उससे पहले इसी साल अप्रैल-मई में पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव होंगे, जहां वामदलों के साथ-साथ सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस भी BJP को किसान विरोधी ठहराने में जुटी है. वामदलों ने इसके लिए खास तैयारियां की हैं और महिला किसानों के मोर्चे उतार दिए हैं. अगर वहां BJP के खिलाफ हवा बनी, तो पूर्वी राज्य के इस भद्रलोक पर कमल खिलना मुश्किल हो सकता है.

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