शौक बना जुनून और जुनून बन गया करियर! नौकरी छोड़, tracking से लाखों कमा रही हैं यह इंजीनियर

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Deveshwari tracking

उत्तराखंड की ‘ट्रैकिंग गर्ल’ देवेश्वरी बिष्ट ने अपनी नौकरी छोड़कर, अपना ट्रेवल स्टार्टअप शुरू किया, जिसके जरिए वह देश-दुनिया को पहाड़ों की संस्कृति और खूबसूरती से परिचित करा रही हैं.

“मैं उड़ना चाहता हूँ, दौड़ना चाहता हूँ, गिरना भी चाहता हूँ. बस रुकना नहीं चाहता…” फिल्म ‘ये जवानी है दीवानी’ का यह डायलॉग, आज के समय में बहुत से भारतीय युवाओं पर सटीक बैठता है. ऐसे लोग, जो अपने शौक और जूनून के लिए मुश्किल से मुश्किल रास्ता भी अपनाने से नहीं कतरा रहे हैं. क्योंकि इस राह पर चलकर वे भले ही करोड़ों रुपए न कमा सकें, लेकिन सुकून और अनुभव जरूर कमा रहे हैं. ऐसी एक कहानी उत्तराखंड की देवेश्वरी बिष्ट की है, जिन्हें ‘ट्रैकिंग गर्ल’ के नाम से जाना जाता है.

उत्तराखंड के चमोली जिले से संबंध रखने वाली 27 वर्षीया देवेश्वरी बिष्ट एक मध्यम-वर्गीय परिवार से हैं. उनके घर में सभी लोग नौकरी-पेशे वाले हैं. उन्होंने भी सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया है. देवेश्वरी ने पढ़ाई के बाद, छह साल तक नौकरी भी की. लेकिन उनकी मंजिल कुछ और थी और इसलिए नौकरी छोड़कर एक बहुत ही अलग राह चुनी.

देवेश्वरी ने ‘ट्रैकिंग और फोटोग्राफी’ में अपना करियर बनाया. नौकरी छोड़कर अपना स्टार्टअप शुरू किया, जिसके जरिए वह लोगों को ट्रैकिंग कराती हैं और स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर दे रही हैं. वह अब तक खुद 30 से ज्यादा ट्रैक कर चुकी हैं और 100 से ज्यादा लोगों को उन्होंने ट्रैकिंग कराई है. वह लोगों को पंचकेदार, पंचबदरी, फूलों की घाटी, हेमकुंड, स्वर्गारोहणी, कुंवारी पास, दयारा बुग्याल, पंवालीकांठा, पिंडारी ग्लेशियर, कागभूषंडी, देवरियाताल आदि से रू-ब-रू करा चुकी हैं.

अपने इस सफर के बारे में देवेश्वरी ने द बेटर इंडिया से विस्तार में बात की.

नौकरी करते हुए, लगा ट्रैकिंग (tracking) का चस्का

देवेश्वरी बताती हैं कि साल 2012 में, वह मिनी हाइड्रो पावर में नौकरी कर रही थीं. उसी दौरान उन्होंने राज्य के अलग-अलग इलाकों की यात्रा करना और ट्रैकिंग (tracking) करना शुरू किया. उन्हें जैसे ही मौका मिलता वह अपना बैग पैक करके ट्रैकिंग के लिए निकल जाती. उन्होंने कहा, “मैं शुरुआत में, सिर्फ घूमना चाहती थी लेकिन फिर यह शौक एक तरह से जुनून में बदलता गया। उत्तराखंड में ट्रैकिंग के लिए जितनी भी जगहें हैं, मैं लगभग सभी जगह पर गयी हूँ. इसी दौरान, मेरे यात्रियों के साथ-साथ ग्रामीणों से भी संपर्क बने और मुझे लगने लगा कि क्या पहाड़ों के दुर्गम क्षेत्रों में बसे इन लोगों के लिए हम कुछ कर सकते हैं? क्योंकि अगर आज हमने कुछ नहीं किया तो वह दिन दूर नहीं जब पलायन के कारण हम पहाड़ों की संस्कृति को खो देंगे.”

ट्रैकिंग करते-करते, उन्हें फोटोग्राफी करने का भी मन हुआ. क्योंकि देवेश्वरी पहाड़ों की अतुल्य खूबसूरती को तस्वीरों में कैद करके सारी दुनिया तक पहुँचाना चाहती थीं. 2013 में उन्होंने एक कैमरा भी खरीद लिया और अपनी हर यात्रा के दौरान, वह अलग-अलग जगहों की खूबसूरत तस्वीरें खींचने लगीं. वह बताती हैं कि फिर एक समय ऐसा आया जब उन्हें अपनी नौकरी में बदलाव चाहिए था. लेकिन नौकरी बदलने का मतलब था पहाड़ों से दूर जाना और देवेश्वरी ऐसा करना नहीं चाहती थीं. इसलिए उन्होंने अपने दिल की सुनी और ‘ट्रैकिंग’ में अपना करियर बनाने की ठानी.

साल 2016 में उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी. वह कहती हैं, “मैंने ‘द ग्रेट हिमालयन जर्नी‘ के नाम से अपना छोटा-सा स्टार्टअप शुरू किया. इसके जरिए मैं दूसरी जगहों से आने वाले लोगों के लिए उत्तराखंड के अलग-अलग इलाके में ट्रैकिंग की व्यवस्था करती हूँ. कई बार मैं खुद उनके साथ ट्रैकिंग पर जाती हूँ और कभी-कभी उनके लिए लोकल गाइड की व्यवस्था करती हूँ. इसके अलावा, उनके रहने-खाने के इंतजाम के साथ, पहाड़ों पर कैंपिंग की व्यवस्था भी करती हूँ. वैसे तो ट्रेवलिंग को आसान बनाने के लिए बड़ी-बड़ी कंपनियां पहले से ही हैं लेकिन मेरा उद्देश्य अपने साथ पहाड़ के लोगों को भी आगे बढ़ाना है.”

स्थानीय लोगों को रोजगार

देवेश्वरी बताती हैं कि जिस भी जगह वह लोगों को ट्रैकिंग के लिए लेकर जाती हैं, वहां ग्रामीणों को रोजगार के अवसर देने की कोशिश करती हैं. जैसे वह हमेशा लोकल गाइड ही ट्रैकर्स के साथ भेजती हैं क्योंकि उन्हें अपने इलाके के बारे में अच्छे से पता होता है. इसके अलावा, वह कोशिश करती हैं कि यात्री स्थानीय परिवारों के साथ रहें और उनका बनाया स्थानीय और पारंपरिक खाना खाएं. “इससे बाहर के लोगों को हमारी संस्कृति के बारे में पता चलता है और स्थानीय लोगों को कुछ कमाई करने का मौका मिलता है. इसलिए मैं यात्रियों के लिए कैंपिंग की व्यवस्था सिर्फ उन्हीं जगहों पर करती हूँ, जिसके आसपास कोई गाँव हो. साथ ही, हमारी कोशिश पहाड़ों के अनाज, दाल और मसाले आदि को प्रोमोट करने की भी रहती है,

उन्होंने कहा. इसके साथ ही, देवेश्वरी प्रोफेशनल लेवल पर फोटोग्राफी करती हैं और अपनी खीचीं गयी तस्वीरों को प्रतियोगिताओं में भेजने के अलावा, कुछ होटल्स आदि को भी दे रही हैं. साल 2019 में उन्हें ‘केदारनाथ फोटोग्राफी कॉन्टेस्ट‘ में दूसरा स्थान मिला था.

देवेश्वरी कहती हैं कि ट्रैकिंग के काम से उन्होंने सालाना तीन-चार लाख रुपए तक कमाए हैं. लेकिन, कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण उनका ट्रैकिंग का काम फिलहाल बंद है. उन्होंने बताया, “हम सब जानते हैं कि ट्रेवल इंडस्ट्री पर कोरोना का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा है. हालांकि, पिछले साल लॉकडाउन खुलने के बाद मुझे कई ट्रैकिंग ग्रुप्स ने संपर्क किया कि हम उन्हें ट्रैकिंग के लिए सर्विसेज दें. लेकिन मैंने मना कर दिया क्योंकि मैं नहीं चाहती कि गलती से भी पहाड़ों में रह रहे लोगों तक यह बीमारी पहुंचे. इसलिए अब मैं अलग तरीकों से उनकी मदद कर रही हूँ.

फिलहाल, देवेश्वरी पहाड़ के लोगों द्वारा उगाये जाने वाले अनाज, दाल और मसालों को शहरों में मार्किट करने की कोशिश कर रही हैं. जिससे गाँव के लोगों के घरों का चूल्हा जलता रहे. साथ ही, वह घरों में पॉलीहाउस लगाने की योजना पर भी काम कर रही हैं. देवेश्वरी कहती हैं कि ट्रेवलिंग ने उन्हें उनके राज्य से सही मायनों में रूबरू कराया है. अलग-अलग पहाड़ी इलाकों की यात्रा करके उन्हें समझ में आया कि पहाड़ों को बचाना बहुत जरूरी है. इसलिए वह हर संभव तरीके से पहाड़ों को प्रोमोट करती हैं.

इस क्षेत्र में अभी ज्यादा लड़कियां और महिलाएं नही हैं. हमें सरकारी और निजी स्तर पर महिला ट्रैकर्स को बढ़ावा देना चाहिए. मैं हर लड़की और युवा से बस यही कहूँगी कि अपने दिल की सुने. मुश्किलें बहुत सी आएँगी लेकिन यह आपको तय करना है कि आपके लिए सफलता क्या है? इसलिए हमेशा आगे बढ़ते रहें.

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